Wednesday, 26 April 2023

lahar 40-50

लहर लहर ३

40

आईना अपना कुछ नहीं बताता, तुम्हारा सच बोलता है। कभी कभी वह आभासी सच बोलता है जैसे कि बायें गाल पर लगे तिल को दायें गाल पर बताता है। तुम सामने रहते हो तो वह केवल तुम्हें बताता है और तुम्हारे हटने के बाद दूसरों को तुम्हारी कोई बात नहीं बताता है। आईना सच बोलता है पर चुगलखोर नहीं है। यह उम्मीद कभी मत करना कि तुम मैला परिधान पहने हुए हो तो वह साफ कर के बता देगा। तुम्हारी रोती शक्ल को आइना मुस्कुराता हुआ नहीं बता पाएगा। तुमने अगर मुखौटा पहन लिया तो तुम्हें अपनी असलियत को वह तो क्या कोई और भी नही बता पाएगा। तुम साफ साफ दिखो इसके लिये समय समय पर उस पर लगी गर्द को साफ करते रहना जरूरी है।
आईने में दिखा सच असल में वह रूप है जो लोगों को उस तरह दिखाई देगा। तुम्हारा सच है तुम्हारी अन्तरात्मा बताएगी। आईना तुम्हारे सिद्धान्त नही, आचरण और व्यवहार बताता है। आईना तुम्हारा इतिहास नहीं वर्तमान बताता है। उसके पास इतिहास होता तो वह तुम्हें तुम्हारा बचपन दिखा देता। वह रीयल टाइम कमेन्ट्री है। तुम्हारे आँसुओं से आईना गीला नहीं होगा। तुम्हारे आँसू तुम्हारे हैं।
तुम्हारे आसपास अथवा अँधेरे कमरे में वह मौन है पर तुम्हारे उजाले वह तुम्हें लौटा देता है। अपने वर्तमानकाल का संज्ञान जानना हो तो आईने की साफगोई से सीखो। भविष्य भी वह नहीं दिखा सकता।
अपना आईना टूटने मत दो वरना तुम टुकड़े टुकड़े दिखाई दोगे। अपने खुद के सच से डर कर आईना देखना छोड़ मत देना वरना हो सकता है तुम फिक्टीशियस वर्ल्ड में जीते रहोगे। आईना तुम्हारा जितना स्पष्ट सच बताएगा उतना दुनिया में कोई नही बता सकता। तुम खुद भी खुद से झूँठ बोल लेते हो पर आईना नहीं।
आईना तुम्हारे लिये है तुम आईने के लिये नहीं हो इसलिये आईने में अपना सच देख कर अपने काम पर चल पड़ो।

रामनारायण सोनी

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41

तुममें पंख हैं, बताओ तुम्हें सोने का पिंजरा चाहिये या खुला खाली आसमान? पिंजरे में तुम्हारे लिये तैयार खाना पानी मिलता है। पिंजरे का मालिक तुम्हारा परिचय बड़े बड़ों से करावेगा, तुम्हारे परिचय के साथ अपना रौबदाब भी बतावेगा। दूसरी तरफ वहाँ आसमान में तुम्हारी अपनी अलग ही दुनिया है, रिश्तेदार हैं, प्रकृति ने तुम्हारे लिये ताजे व्यंजन परोस रखे हैं। तुम वहाँ सरोवर में छपाक छपाक करके नहा सकते हो। वहाँ छोटे बड़े पंखों वाले, कई तरह की मधुर बोली बोलने वाले और भी कुनबे हैं। वहाँ झरने गाते हैं रात दिन, वहाँ धूप भी है और सुहानी छाँव भी है, तिनकों और प्राकृतिक रेशों से बने वातानुकूलित नीड़ हैं। वहाँ तुम्हें प्रभात में ऊषा की अरुणिम आभा और ढलती शाम में परिन्दों से भरा आकाश उपलब्ध होता है। यहाँ पिंजरे की सलाखें तुम्हारे पंखो को अर्थहीन कर देंगी वहाँ पवन तुम्हें अपनी पीठ पर बिठा कर दुलारेगा। यहाँ कटोरियों में बासी पानी भरा है पर वहाँ तुम्हारे लिये बारिश की झिरमिराती बूँदें मिलेगी। और बहती नदी का ताजा नीर चौबीस घण्टे, सातों दिन तैयार है। यहाँ तुम्हें ये कंक्रीट के जंगल पर उड़ते हुए तुम्हें  मकान की छतें, आग उगलती सड़कें और परकोटे नीचे दिखाई देंगे। पर वहाँ पेड़ों से झड़े पत्तों और नर्म नर्म घास के बिछौने मिलेंगे।
तुम्हें बस्ती के ऐशो आराम चाहिये या प्रकृति का अखूट वैभव। अब चुनाव तुम्हारा है।
कहीं तुम वह मछली तो नही हो जो नदी में बाढ़ के समय समुन्दर छोड़ कर तैरती हुई शहर में बने घाटों के किनारे पर आ गई हो? यहाँ पानी तो मीठा है पर संभवतः कुछ लोग काँटों में केंचुआ उलझा कर तुम्हें फँसाने की ताक में ही बैठे हैं। उलझ गई तो तुम्हारी इहलीला समाप्त भी हो सकती है। अगर इन से बच भी गई तो, तुम्हें पता नहीं है, लोग इस नदी को मोटरों में भर भर कर उलीच रहे हैं। एक दिन सारा पानी खत्म हो जावेगा। सूखने के बाद गीली रेत ही बचेगी तब बड़े बड़े डम्पर आ कर रेत भी भर ले जावेंगे। बिना पानी के तुम अपने अस्तिव को कायम कैसे रख सकोगी। अब यह चुनाव तुम्हारा है कि तुम्हें खारे पानी का अपना वह घर पसन्द है या मीठे पानी की वह अधमरी नदी? चुनाव तुम्हारा अपना है। कहाँ रहना चाहोगे? यहाँ कि वहाँ?
"क्या चाहिये? बस्ती का विश्राम या प्रकृति का विलास? चुनाव तुम्हें करना है"

रामनारायण सोनी

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42

दिशाएँ दस हैं। पथ कोई सीधे नहीं है। हर एक के जीवन में छोटे बड़े, आड़े-तिरछे मोड़ ही मोड़ है, दोराहे, तिराहे, चौराहे हैं। किसी के आगे बढ़ते हुए कदम दस दिशाओं में से किसी भी दिशा में मुड़ सकते हैं। हर मोड़ व्यक्ति को कहीं न कहीं पर ले जाता है। सीधा सादा मोड़ जीवन की दिशा तो बदलता है पर मार्ग नहीं बदलता। जीवन में परिवर्तन लाने वाले हर तिराहे, चौराहे पर बँटने वाले रास्ते में से एक का चुनाव करना अपने अपने विवेक, क्षमता और ध्येय पर निर्भर है। जीवनरथ के पहिये कहीं रुकते नहीं है।
एक व्यक्ति यदि सन्यासी हो जाता है फिर अगर वह इस जगत में वापस लौटता है तो निर्लिप्तता का भाव लेकर लौटता है। सच मानें तो ऐसा लौटना ग्यारहवीं दिशा का 'एलीवेटेड यू टर्न' है। युवराज सिद्धार्थ के सामने भविष्य में राज्य का वैभव प्राप्त होना तय था। लेकिन वे वीतरागी हो कर सन्यास की ओर मुड़ गये।
सन्यासी अक्सर युगान्तर के बाद युगबोध को प्राप्त होते हैं वे संसार की उठा पटक को छोड़ कर सन्यासी होते हैं पर भगवान बुद्ध सन्यास के उपरान्त लोककल्याण के हेतु से फिर संसार में लौटे। इतिहास गवाह है कि भगवान बुद्ध युगान्तर के बाद युगबोध को फिर प्राप्त हुए और पीड़ित संसार को बोधिसत्व की उपलब्धि हो गई। उनकी यह यात्रा पहले एक नगर से अरण्यक की ओर हुई फिर उस अरण्यक से एक अप्रतिम अभयारण्य की ओर। उनकी यह यात्रा भय से अभय की ओर की गई यात्रा थी। भय जन्म,  मृत्यु, जरा और व्याधियों का भऔर अभय होने का अर्थ स्वयं मुक्ति ही है।
हम जानते हैं कि क्षोभित मन से छूटे संसार में निक्षेप के अतिरिक्त क्या मिल सकता है? परन्तु इस दशा में अगर दिशा बोध और दृढ़ निश्चय हो तो जीवन ही परिपूर्ण हो जाता है।
सम्बोधि का मार्ग शोर से शान्ति की ओर का मार्ग है, स्वयं के त्याग और तप से लोकोपकार का मार्ग है। भगवान बुद्ध के महाप्रयाण के पहले घटित हुआ था एक पावन महाप्रस्थान जो नव ज्योतिपुञ्ज लेकर संसार में लौटा और अपने प्रकाश से जगत आलोकित हो गया। यह था युवराज सिद्धार्थ का व्यक्ति से चल कर भगवान बुद्ध होने का पथसंचलन।
"सन्यास का यह एक अनोखा अवतरण था"

रामनारायण सोनी

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जड़ में चेतन का आविर्भाव

कभी कभी हम जो देखते है वह वास्तविकता में कुछ और ही होता है। इसे भ्रम भी नहीं कहा जा सकता। समुद्र के किनारे खड़े हो कर हम देखते हैं तो हमें केवल लहरें दिखाई देती है। अकेली ये लहरें समुद्र नहीं है। समुद्र के भीतर अगर गोता लगा कर देखें तो दिखाई देने वाला पानी, केवल पानी समुद्र नहीं है। आग लगने पर उठने वाला धुआँ कुछ दूर जा कर अदृष्य हो जाता है हमें लगता है वह आकाश में जा कर खो गया पर असल में वह वायुमण्डल की हवा के अणुओं के बीच छिप गया है। दुनिया में जिस जिस वस्तु के जो जो रंग दिखाई देते हैं वे उनके अपने नहीं हैं अपितु वे सूर्य के प्रकाश के वर्णक्रम के एक खास रंग को परावर्तित कर रहे हैं जैसे पत्ता हरा इसलिये दिखाई दे रहा है कि वह उस पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी में से केवल हरा रंग परावर्तित करता है। चाँदनी रात में तारे कहीं चले नहीं जाते है पर लगता है चाँदनी के उजाले ने उन्हें ढँक लिया है। मरुस्थल की तपती रेत पर से उठती गर्म हवा भी पानी की झील लगने लगती है पर वह पानी नहीं है। अर्थात् जो दिखाई पड़ रहा है उसकी वास्तविकता कुछ और ही होती है।
एक बीज जमीन में बोते हैं तो उसमें अंकुर फूटता है, वह बड़ा होते होते पौधा अथवा वृक्ष हो जाता है। हमें यह सारी प्रक्रिया भौतिक प्रकिया मालूम पड़ती है। हम इस बीज से वृक्ष बनने की प्रकिया के पूर्ण साक्षी हो सकते हैं। लेकिन जो दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह वैसा नहीं है। इसकी एक चमत्कारिक घटना को हम देख नहीं सकते। बीज एक जड़ वस्तु है, ठीक एक कंकर की तरह। विज्ञान भी इस बात को सिद्ध कर चुका है कि पौधा, वृक्ष आदि अन्य वनस्पतियाँ जीवित है। बड़ा चमत्कार है कि जड़ बीज में से जीवन कैसे प्रस्फुटित हो गया। वस्तुतः जड़ बीज में से अंकुरण की भौतिक प्रक्रिया को हम देखते हैं पर सृष्टिकर्ता की चेतना का वह अंश हमें दिखाई नहीं देता जिसने अंकुर में जीवन का संचार होता है। वास्तव में बीज बोने से वृक्ष होने और फिर उसके सर्वांगीण विकास के प्रत्येक क्षण में चेतना अनवरत काम करती है। वृक्ष को काट देने अथवा आयु पूर्ण हो कर सूख जाने पर वृक्ष फिर वह जड़ रूप में परिवर्तित हो जाता है। हम कहतें हैं वृक्ष मर गया। लेकिन इस आद्योपान्त घटना में हमें उस परमचेतन और उसकी चेतना का आभास नहीं होता।
"हम उस परम चैतन्य और उसकी चेतना का आभास करें"।

रामनारायण सोनी
२२.०३.२३

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लहर-लहर

46

हार-जीत, जीत-हार

क्या तुमने यही सोच रक्खा है कि तुम्हें हमेशा ही मनचाहा मिलेगा, अनचाहा कभी भी नहीं मिलेगा, यदि ऐसा है तो तो तुम गलत हो। तुम्हें बचपन से खेल खेलना सिखाया गया है जिसमें कभी जीत तो कभी हार होती है। तुम्हें दोनों तरह की आदत होनी चाहिये। तुमने यह शायद सोचा ही नहीं कि तुम्हारी हर जीत में किसी की हार छुपी होती है और तुम्हारी हर हार में कोई सीख छुपी होती है। सावधान! कुछ जीत जीवन को आघात कर सकती है, उसे ऊँचाइयों से गिरा सकती हैं जैसे रावण जीतता गया और एक दिन आततायी हो गया। बुद्ध एक दिन छोटी सी यात्रा में विह्वल हो कर हारे और वानप्रस्थी हो गये पर जब वापस लौटे तो जीत-हार की परिधि से बाहर निकल कर लोककल्याण के सूत्र ले कर जगत में लौटे।
जीवन में हार जीत का सम्मिश्रण है। याद रहे जीत में दम्भ न हो और हार में अवसाद न हो। ये तो रोज की छोटी-छोटी स्पर्धाओं के तात्कालिक परिणाम हैं जैसे चलती राह में मील के पत्थर होते हैं। हर सुबह अँधेरे पर जीत नहीं है, हर साँझ उजाले की हार नहीं है यह रात दिन के पड़ावों पर घटित होने वाला क्रम है। सुबह श्रम ले कर आती है और साँझ तारों भरी रात अथवा चाँदनी ले कर आती है। न तो यह संघर्ष है न ही द्वन्द्व अपितु यह एक क्रम है।
एवरेस्ट पर चढ़ कर झण्डा फहराना लोग एवरेस्ट को जीतना समझते हैं, क्या एवरेस्ट हारा है? वह तो आदिकाल से स्वानुशासन में खड़ा है। वस्तुतः एवरेस्ट के शिखर पर पहुँच जाना एक उपलब्धि है, किसी की हार-जीत नहीं।
एक और बड़ी अजीब बात है कि कभी कभी तुम किसी और की जीत को अपनी हार मान लेते हो, उसके विकास को, उन्नति को देख कर अपने को हारा महसूस करते हो वहीं अपनी किसी उपलब्धि में किसी पर अपनी जीत का आभास करते हो। ये दोनो स्थितियाँ अवाञ्छनीय हैं, आभासी हैं।
इसलिये ध्यान केवल खेल पर हो, खेल भावना से खेल हो। "खेलो बस खेल के लिये फिर परिणाम जो भी हो।"

रामनारायण सोनी
27.03.23
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"गुनगुनाहट"
भँवरा पराग का रसपान करने के लिये फूलों तक जाता है इस दौरान एक ध्वनि स्वतः उत्पन्न होती है जिसे हम 'गुनगुन' कहते हैं। भाषा का यह शब्द प्रकृति ने स्वयं बनाया है। हम यह गुनगुनाहट सुनते हैं तो मन आनन्दित  हो जाता है। इस गुनगुनाहट के पीछे झाँक कर देखें तो पता चनेगा कि भँवरे को आनन्दानुभूति होती है। इसलिये एक लय की अनुभूति भँवरे के भी गुनगुनाहट के रूप में होती है। तात्पर्य यह कि उसके भीतर भी आनन्द है और बाहर भी आनन्द है।
ये गुनगुनाहट
बड़ी ही खूबसूरत चीज़ है,
शब्द और भाव तो भीतर रमते हैं!
और अनुनाद के स्वर
अपने अन्तस का
तरोताजा रेशमी अंकुरण है!!
माना कि महासंकट है अभी
इस सन्नाटे में भी,
प्रकृति किसी छोर से
गा रही है, नाच रही है
महसूस करो इसे,
सुनो! देखो!! गाओ!!
नाच सका तो झूम कर नाचो
तुममें एक बच्चा चुपचाप बैठा है। जगाओ उसे, उठाओ उसे। तुम्हारे इस छ्द्म अहंकार में उसका दम घुट रहा है। उसके जागते ही यह प्रकृति तुम्हें जैसी है वैसी दिखाई देने लगेगी, सरल, सहज ,सुन्दर।
"तन की आँखों के संग संग मन की आँखे भी खोलो।"

रामनारायण सोनी
३१.०३.२३

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आपके मालिक आप हैं

शायद खुद को उपस्थित सम-विषम परिस्थितियों से किसी तरह अपने आप को दूर ले जाना नशा है। सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक अथवा नैतिक मूल्यों और उनके संबधित समस्याओं प्रति अपने आप को अक्षम पाने पर आदमी भाग कर नशे की ओर मुड़ जाता है। नशे की स्थिति में आदमी के दिमाग की विचारण शक्ति सिमट कर बहुत सीमित हो जाती है और उसे लगता है मैं उन समस्याओं से बहुत दूर आ गया हूँ। एक पक्षी होता है शुतुर्मुग जो पक्षियों में सब से बड़ा होता है। वह चालीस किलो मीटर प्रतिघण्टा की गति से दौड़ सकता है। जब कभी वह खतरा महसूस करता है तो अपना सिर कहीं छिपाने की कोशीश करता है और ऐसा होने पर वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है पर आखिरकार शिकार हो जाता है। आदमी नशा भी इसी तरह करता है।
नशा फिर नशा है उतरते ही आम जिन्दगी में लौटना पड़ता है जब लौटता है तो कुछ लुटा कर ही लौटता है। जो गिरह में था उसे लुटा कर लौटता है तो वास्तविकता और अधिक भयावह हो जाती है। आश्चर्य की बात है कि इसके बाद वह और अधिक नशा करने लगता है। सोच लो उसके वे कदम किस ओर चलाना चाहिये? आदमी किसी और का मालिक हो न हो वह स्वयं का मालिक होता ही है। नशे की लत से उसे केवल वही बचा सकता है कोई और नहीं।
"सब से पहले अपने मालिक खुद बनें।"

रामनारायण सोनी
९.४.२३

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लहर लहर

50
अद्वैताभास

सागर शान्त था, बल्कि कहें कि सागर प्रशान्त था। सतह को छूती हुई तेज हवा चली और एक लहर खड़ी हो गई, यह लहर चल भी पड़ी क्योंकि अगर खड़ी रह गई तो लहर तुरन्त मर भी जाएगी। लहर के खड़े होते ही एक अहंकार खड़ा हो गया कि मैं लहर हूँ। लहर कहती है कि मैं सागर नहीं हूँ और उसका अहंकार उसे यह मानने नहीं देता कि वह असल में पानी है। अहंकार खड़ा होते ही रिश्ते खड़े हो गये। रिश्ता सागर से, रिश्ता दूसरी लहर से, रिश्ता बहते हुए पवन से, रिश्ता गति से, रिश्ता अपनी स्थिति से। और भी कई जाने अनजाने बेनामी रिश्ते खड़े हो गये लहर के चारों ओर। रिश्तों की इस भीड़ में उसे अपनी एक पहिचान याद नहीं रही कि लहर केवल एक अनित्य आकार है। असल में वह पानी ही है और लहर में से लहर हटा लिया तो जो बचेगा वह पानी ही होगा। लेकिन लहर में से पानी हटा लिया तो कुछ भी नहीं बचेगा। पास खड़ी लहर भी पानी है, सागर भी पानी है सब ओर पानी ही पानी है। यही पानी कभी सागर है, कभी एक लहर है, कभी एक और लहर है, कभी यह पानी बूँद है, कभी वाष्प है, कभी बर्फ है, कभी बादल है, कभी नदी है, झील है, सरोवर है तो कभी नदी नाले की धार है। ये सब के सब एक अहंकार ले कर बैठे हैं, एक 'मैं' ले कर बैठे हैं। ये जितने भी नाम हैं सब अनित्य है। ये नाम अस्थाई रूप से मिले हैं। ये आकार के, प्रकार के, स्थिति के, अवस्था के कारण हैं और परिवर्तन होते ही वे नाम खो जाते हैं। नदी जब बहती है तो नदी है, पानी की नदी। सागर में जा कर मिली तो नाम खो गया पर पानी नहीं खोया। नदी ने स्वीकार किया अपने मैं के खोने का तो बस वह पानी हो गई। एक अकेले 'मैं' के मिटते ही पानी का आभास प्रकट हो जाता है। रिश्ते गल जाते हैं, न तू 'तू' है न मैं 'मैं' रह पाता हूँ। सब तरफ, सब में, मुझ में केवल वह एक अद्वैत है। जैसे पानी की व्यापकता का बोध प्रकट हो जाता है तो द्वैत का बोध चला जाता है। वह जो 'वह' है वह भी मैं ही हूँ। यही ब्रह्मत्व है।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचिद्जगात्यां जगत।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।। ईशावास्योपनिषद्।।१।।

रामनारायण सोनी
25.04.23




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