Thursday, 27 April 2023

आत्मिका


आत्मिका


लहर-लहर


कहते हैं सागर की छोटी छोटी लहरें मिल कर बड़ी लहर बनाती है। ये लहरें सागर का अभिन्न अंग है। लहरें उत्साह, गति, विचलन, प्रचलन के माध्यम से मनुष्य जीवन का प्रतीक बन जाती हैं। वे जन्म लेती हैं जीती हैं, उछलती कूदती हैं, अवसाद प्रतिसाद में पड़ती हैं, थपेड़े सहती है और फिर मर जाती हैं। ये छोटी छोटी लहरें कुछ देर जी कर बहुत कुछ कह जाती है। इसी चिन्तन से मेरे अन्तस में उभरे इन लहरों के स्वरों में मैंने जो सुना उसे लिखने का प्रयास यहाँ किया है। हर कथ्य के अन्त में उसका निहित उद्देश्य है। इसमें पचास नन्हीं नन्हीं लहरें नव शाविकाएँ हैं। मेरा यह एक प्रयोगात्मक प्रयास है।

मुझे याद आती है सुमित्रानंदन पंत की रचना 'सागर की लहर लहर'। वे कहते हैं

"सागर की लहर लहर में

है हास स्वर्ण किरणों का,

सागर के अंतस्तन में

अवसाद अवाक् कणों का।

यह जीवन का है सागर,

जग-जीवन का है सागर,

प्रिय-प्रिय विषाद रे इसका

प्रिय प्रिय आह्लाद रे इसका।

उक्त पंक्तियाँ मेरी प्रस्तुत कृति "लहर-लहर" में प्रतिबिम्बित है। वस्तुतः झरझराता झरना, झक्क सफेद बर्फ, रंगीन पुष्प, वृक्षों को आलिंगन करती लताएँ, भंवरें की गुन गुनाती गुंजन, प्रभात में खिली उषा की स्वर्णिम किरण, शीतल मन्द सुगन्धित बहती पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब संक्षिप्त से इन लघु आलेखों में अनायास ही आ गये हैं। प्रकृति के इन उपादानों के संग जीवन-सागर और जग-जीवन के भीतर सुख-दुःख की छाया में उभरता पलता तरल जीवन आप इन छोटी छोटी लहरों के साथ तरंगित महसूस करेंगे।

उपनिषदों के अनुसार इस सम्पूर्ण प्रकृति में ईश्वर की सर्वव्यापकता के स्पष्ट संकेत है। जिस प्रकार पुष्पों में सुगन्ध, दूध में घृत, तिल के दानों में तेल छिपा रहता है, उसका प्रत्यक्ष नही होता किन्तु उसके स्वरुप की अनुभूति अवश्य होती है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति के कण-कण में ईश्वर की शक्तियाँ समायी रहती है। अर्थात् "यह सम्पूर्ण विश्व और प्रकृति ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है।" वह इसी में व्याप्त है। देश, काल और प्रकृति आदि परमात्मा के ही आवरण है।

वस्तुतः प्रकृति को उसके नैसर्गिक स्वरूप के साथ आध्यात्मिक स्वरूप का विमर्श देखा जावे तो वह समग्र रूप से विशुद्ध भारतीय जीवन दर्शन प्रस्तुत करता है। इसलिये सागर की इन छोटी छोटी लहरों के साथ हमारे जीवन की लहरों का तादात्म स्थापित कर के देखें कि वे अपने आचरण और व्यवहार से जीवन के कुछ महीन सूत्र कह जाती हैं। इस छोटे से कटोरे में इन चंचल सी लहरों का उपादान अपने प्रिय पाठकों को सादर सस्नेह समर्पित है।


रामनारायण सोनी

२८.०४.२३


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