मुझे याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के बने सूत के कसीदे वाले झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम। फिर माँ उँगली छुड़ा कर चली गई पूर्ण आश्वस्ती से पाठशाला को सौंप कर।
माँ के कहे अनुसार मैने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ।
ऐसे श्री गुरुदेव को यह कृति समर्पित करता हूँ
No comments:
Post a Comment