Friday, 19 May 2023

वन्दन मेरा दयानिधे!

वन्दन मेरा दयानिधे! 

मन क्यों रचा कि जिसमें सारी इच्छाएँ बलवती हुई
तन के पोर पोर में जागी लिप्साएँ आहूत हुई।
सुख दुःख की गठरी अपने इस माथे पर धर कर 
तू क्या जाने बैरी जग में क्या क्या मेरी गति हुई।।
वन्दन मेरा दयानिधे! कृपा करो हे कृपानिधे!

तुम धरा गगन के स्वामी तुम ही उन्नायक हो
तुमने प्राण सृष्टि में डाले तुम ही परिचायक हो।
मैंने तेरे अनुशासन में यह केवल कर्म चुना है
पाप पुण्य की मेरी बही के तुम ही अधिनायक हो।।
वन्दन मेरा दयानिधे! कृपा करो हे कृपानिधे!

चरण दिये चलने को, भुजदण्डों में जोश भरा है
तेरे नजारे देख सकूँ इन, नयनों में उजास धरा है।
जीवन को जीवित रखने को, मेरे नासा रन्ध्रों से
पंच प्राण से तन के घट में अमृत कोष भरा है।।
वन्दन मेरा दयानिधे! कृपा करो हे कृपानिधे!

खिले सुमन फिर इसी धरा पर जार जार गिरते हैं
कोमल कोंपल पतझर पाकर इक दिन सब झरते हैं।
प्यास धरा की रच कर तूने बादल भी रच डाले
ध्वंसों के इतिहास सृजन की कथा लिये फिरते हैं।।
वन्दन मेरा दयानिधे! कृपा करो हे कृपानिधे!

रामनारायण सोनी

35 to 56

[27/11/2023, 8:26 pm] P K Mathur: Lahar      Lahar      35 In the present write-up, the author has very rightly advised us all to keep inten...