लहर-लहर
संकल्प!!!
मित्रों! आज से चिन्तन का एक नया अध्याय शुरू करते हैं। ये अध्याय छोटी छोटी लहरों के जैसे हों और फिर मिलकर एक बड़ी लहर बना दे। इसकी स्क्रिप्ट बहुत छोटी छोटी (एक पेज से कम) रहेगी। हर एक के अन्त में उसका निहित उद्देश्य अंकित होगा।
इस धारावाहिक 'लहर लहर' की प्रतिदिन एक कड़ी, कुल -50 कड़ी, लिखी जा रही है जो अन्त में एक लघु पुस्तक का रूप ले लेगी।
यह एक प्रयोगात्मक प्रयास है।
1
अपना अपना क्षितिज
जिस प्रकार मैं बरसात में अपना छाता, कछुआ अपनी कढ़ाईनुमा पीठ अपने साथ ले कर चलता है मैं भी अपना क्षितिज साथ ले कर चलता हूँ। इस विषय में तुम मुझसे अलग नहीं हो। कितनी ही तेज दौड़ लगाएँ, कहीं भी चले जाएँ वहाँ फिर वही नया क्षितिज नजर आएगा। इसे आज तक कोई पकड़ नहीं पाया।
इसी तरह हम मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों का अपना क्षितिज ले कर चलते हैं। हम जहाँ जहाँ जाते हैं अपना अपना यह क्षितिज पल्ले बँधा पाते हैं। नया क्षितिज चाहिये तो हमें मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों के परिष्कृत आयाम ढूँढने होंगे। इस बदलाव में सावधानी बरतनी होगी। अगर कोहरा है तो उसे छँटने का इन्तजार करना होगा अन्यथा कहीं गिर-पड़ सकते हैं।
“तो चलो! एक बेहतर क्षितिज खोजते हैं।“
2
डर और उसका निवारण
तुम डर से डरते हो, सहमते हो और सोचते हो कि डर से आमना सामना न हो पर तुम जानते नहीं कि इसी डर के कारण दुनिया में बड़े बड़े काम हो रहे हैं। मौसम के डर से तुमने मकान बनाया। बरसात के डर से छाता खरीद लाए। भूख के डर से बड़े बड़े गोदाम बनाए। गर्मी के डर से पंखे ले आए जो लम्बे समय से छतों में व्यर्थ ही टँगे हुए हैं। जरा देखो तुमने डर डर कर अपने इर्द गिर्द सामानों का कितना जखीरा इकट्ठा कर लिया है। इस डर ने कई कई खोजें संसार को दी है। अगर दीपक बुझने का डर न होता तो बिजली के लट्टुओं की चकाचोंध की ईजाद नहीं होती। सब से बड़ा डर तो मौत का है। इस डर ने कई कई अस्पताल खोल दिये हैं। डरना बुरा नहीं है पर डर के परमानेन्ट डर में रहना बुरा है। डर को बुलाओ मत पर आए हुए को धैर्य से परख कर उसका निवारण ढूँढ लो।
3
भरोसा न हो तो दुनिया अभी के अभी थम जावेगी। कितने अनजान लोग अनजान वाहनों के संग संग या क्रास कर के हमारे चारों ओर से गुजर रहे हैं पर भरोसा है कि वे हमसे टकराएँगे नहीं। अगर भरोसा न होता तो हम सड़क पर कदापि नहीं जाते। भरोसा है कि भले ही मैं सोता रह जाऊँ तो भी सूरज उगेगा, दूध वाला दूध ले कर आवेगा। भरोसा है कि मेरे आसपास जो जो रिश्ते बन गए हैं वे कायम रहेंगे। मुझे जीने के लिये साँस लेते रहना है, तो मुझे यह भरोसा है कि अगर मैं भूल भी जाऊँ तो भी मेरा यह जीवन चलता रहेगा। भरोसा है कि मौसम और ऋतुएँ समय पर आवेंगी जावेंगी। रात और दिन इसी तरह अपने क्रम में चलते ही रहेंगे।
यह भी पक्का भरोसा है कि कहीं न कहीं आज के इस दिन मेरे खाने का इन्तज़ाम हो ही रहा होगा। प्यास बुझाने के लिये पानी मिलेगा ही। मेरे दिन भर के श्रम मिटाने के लिये रात आएगी। भरोसा शायद मेरे जीवन का अनजाने में ही मीत हो गया है। बहुत सारे ऐसे भरोसे हैं जिन्हें मैं प्रत्यक्ष में जानता तक नहीं।
"हर पल कोई न कोई भरोसा मेरे साथ चलता है, शायद मैं इसी आसरे में जिन्दा हूँ।
4
प्यार की अपनी एक पुण्य गंध है, जिसे विज्ञान में केरेक्टरिस्टिक स्मेल कहते हैं। जैसे गुलाब की, चमेली की, मोगरे की, लकड़ी की, पसीने की, मिट्टी की उनकी अपनी अपनी है । प्यार की खुशबू प्यार के आगमन से पहले महकने लगती है। प्यार की सुगन्ध भीनी भीनी सी होती है। प्यार में शोर नहीं सागर जैसी प्रशान्ति है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर तुम्हें एक अपनत्व भरी सुगन्ध महसूस हो रही है तो समझो एक प्रीति का सागर तुम्हारे आसपास ही कहीं मौजूद है। इसका आनन्द लेना हो तो वहाँ चले जाओ, उसमें डूब कर देखो। बारिश में भींगने का अपना मजा तो है पर देखो उस बादल को भी जो बरस रहा है। बहुत दूर से तुम तक चल कर आया है तुम्हें तरबतर करने को। यह मत सोचो कि कौन लाया है? कहाँ से आया है? बस देखो कि वह तुम्हारे सामने है। यह जरूरी नहीं है कि बादल रोज रोज आवेंगे। अब की बार चूके तो फिर न जाने कब मिलेंगे। तन भिंगोने के लिये तुम नकली शावर में रिमझिम बरसात सी तैयार तो कर लोगे पर उसके साथ मन भिंगोने के लिये वे बरसते सुहाने बादल नहीं होंगे। इसलिये चूक मत जाना।
"चलो! यही सुअवसर है, सुसंयोग है।"
5
जिस्म के इतिहास में एक भूगोल भी है, जिस्म की एक लम्बी सी कहानी होती है जिसे तुम जिन्दगी कह सकते हो। जिन्दगी के रोजनामचे में रोज कुछ न कुछ लिखा जाता है। हर दिन के पन्ने के आखिर में बारीक अक्षरों में नियति अपनी ओर से परिणाम लिखती है और उसकी समरी भी वही जोड़ती चली जाती है। इसे तुम 'लेखा-जोखा' कह सकते हो। इस समरी में तुम एक शब्द भी नहीं जोड़ सकते न ही घटा सकते हो पर तसल्ली और समझ से इसे पढ़ सकते हो। इसमें दिल्ली दूरदर्शन के "पाया-खोया" प्रोग्राम जैसा विवरण भी लिखा होता है।
कुछ रूमानी मायनों में हमारा जिस्म एक मकान भर है जिसमें जीवधारी किरायेदार जैसा रहने आता है। हमने इस मकान को बिगाड़ा तो यह सस्ते में जल्दी ही चला भी जाता है। जिन्दगी से प्यार करने वाले इसे करीने से रखते हैं, मेन्टेन करते हैं। जिस्म में लगी कर्मेन्द्रियाँ इसके कल पुर्जे हैं और पुरुषार्थ के संसाधन हैं। इसका इंजिन कमाल का है और ईंधन तो और भी गज़ब का है। जाने क्या क्या खा जाता है। वेज-नॉनवेज, भक्ष्य अभक्ष्य, पक्वान्न कच्चान्न।
परन्तु मजेदार बात तो यह है कि जिस्म न हो तो रूहें कहाँ रहेंगी? वहीं दूसरा अनिवार्य पहलू यह भी है कि रूह नहीं रहे तो यह दो कौड़ी का भी नहीं।
"जिस्म और रूह, दोनों हैं तो हम, तुम और सब हैं। इसे सम्हालो जरा।"
6
तुम शायद यही सोचते हो कि जमीन पर बहुत भीड़ है। आदमियों की भीड़, रिश्तों की भीड़, अपनों परायों की भीड़, चारों तरफ बस भीड़ ही भीड़ । परन्तु तुम इसे भीड़ समझ कर बड़ी भूल कर रहे हो। इसी भीड़ में तुम्हारी संस्कृति, सोहार्द्र, आत्मीयता और प्रेम पल रहा है, और यह सब केवल इस जमीन पर ही मिलेगा। तुमने सोचा मैं इससे बड़ा होना चाहता हूँ, इनसे ऊपर उठना चाहता हूँ, इन पर शासन-प्रशासन करना चाहता हूँ। इसलिये तुम किसी एक मंच पर चढ़ गये या तुम्हें कोई पद मिल गया है, तब तुम थोड़े बड़े हो गये हो। तुम्हारे साथ वहाँ कुछ स्वार्थी लोग ही बचे हैं। चढ़ते चढ़ते तुम पहाड़ पर चढ़ गये यानी कि कुछ और बड़े हो गये। वहाँ जा कर तुम उन सबसे ऊँचे और बड़े लग रहे हो, तब से तुम बिल्कुल अकेले हो गए हो। तब जमीन पर खड़े वे तुम्हारे अपने ही सब लोग तुम्हें बहुत छोटे दिखने लगे। शायद तुम्हें उनसे संवाद करने में भी अपनापन नहीं लग रहा होगा।
बड़े होते होते एक दिन तुम सूरज हो गये। अगर तुम सचमुच सूरज हो गये हो तो तुम्हें दूसरों के लिये जीना और जलना होगा। दूसरों के लिये तपना होगा। दूसरों के लिये अपना समर्पण तैयार करना होगा। इस सब से बड़े 'बड़प्पन' के साइड इफेक्ट भी समझ लो। यहाँ तुम अपने मैदानी रिश्तों और अपनों से बहुत दूर आ गये हो। वे सब भी तुम्हारे ताप और प्रभुत्व के कारण तुमसे डरे डरे से हैं। यहाँ तुम न चाहते हुए भी बिल्कुल ही अकेले हो। क्यों? क्योंकि तुम सूरज बनना चाहते थे और तुम बन गये हो। तुम चाहते थे कि सारे ग्रह उपग्रह तुम्हारे इर्द-गिर्द चक्कर लगाएँ। सारे मौसम और ऋतुओं के तुम नियन्ता हो जाओ। तुम हो गये। पर नोट करो कि "तुम उन सभी अपनों के लिये किसी निर्जन में खो गये हो!" तुम उनसे इन परिस्थितियों में घुलने मिलने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये सुनो!
"जमीन पर छूटे हुए उन लोगों और रिश्तों को फिर से पाना है तो दूरियाँ, अहंता और ताप छोड़ना पड़ेगा, बड़ा होने का अहसास भी।"
7
यह संसार कैसा संसार है? यह सब कुछ भाग रहा है, सब ओर परिवर्तन है, यहाँ ठहराव कुछ नहीं है। सुबह हुई, थोड़ी देर में बदल गई। बरसात आई बरस कर चली गई, बचपन आया चला गया। जो हमेशा से है और रहेगा वह है 'परिवर्तन'। यह नैसर्गिक नियम है। यहाँ सब दौड़ रहे हैं कोई तेज तो कोई धीरे। कोई जीवन ले कर अभी अभी आया है, वह आते ही चल पड़ा है। याने जीवन चल पड़ा। कोई अभी अभी गया वह भी चलते चलते ही गया। ऐसा लगता है कि 'जन्म' स्वयं मृत्यु ले कर पैदा हुआ है। गिन कर सांसें लाया है, रोज उन्हीं में से कुछ खर्च कर रहा है। हम रोज नई माँग लेकर सोते हैं और जब अगली सुबह जागते हैं तो उसकी आपूर्ति में दौड़ने लगते है। पेट की आग, शरीर की माँग, और कभी मन में घुली भाँग हमें बैठने नहीं देती। यह माँग भी परिवर्तनशील है जब एक पूरी होती है तो यात्रा के मील का पत्थर बन कर पीछे छूट जाती है और लगता है कि वह हमसे पीछे दूर भाग रही है। हम आगे भाग रहे हैं। फिर कुछ दूसरी माँगें सामने मुँह बाये खड़ी हैं। "बेहिसाब हसरतें न पालिए, जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।"
समस्त चर अचर और ब्रह्माण्ड का कण कण चलायमान है। किसी ने कहा यह पहाड़ तो अचल है, पर अन्तरिक्ष में जा कर देखो यह धरती पर सवार हो कर सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा में लगा है।
तो स्थिर क्या है? कौन है? नित्य कौन है? अपरिवर्तनीय कौन है? कौन है जो काल अर्थात् समय की सीमाओं से परे है? जो सब बदलता है पर खुद नित्य एक रस है। जो अपरिमेय है। जो निर्माण में भी है और ध्वंस में भी है। जो अनन्त है।
जो कभी खाली नहीं होता ऐसा पूर्ण, जिसमे कुछ भरा नहीं जा सकता ऐसा पूर्ण, जो वहाँ भी है, यहाँ भी है। जिसमें सब है, जो सब में है। बनता भी है, बनाता भी है। इस सृष्टि के लय प्रलय के पहले भी था, है भी, रहेगा भी।
"चलो उस 'कौन' को जानने का प्रयास करें।"
उपनिषद् कहता है..
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
8
मैं समुन्दर हूँ।
मैं खारा जरूर हूँ पर जगत के कल्याण और जीवन के लिये मीठे पानी के बादल भेजता हूँ। मेरी सतह पर शोर है पर मुझ जैसी नीरवता कहीं नहीं। तुम मेरे किनारे आओ मैं तुम्हारे पद प्रक्षालन करूँगा। तुम थोड़ा सा आगे बढ़े और तैरना नहीं जानते हो तो तुम्हें वापस किनारे पर फेंक दूँगा। जो नदियाँ मुझे अपना जल देती है, मैं वापस बादल भेज कर जो लिया उससे भी अधिक हर बरस लौटा देता हूँ। मैं बेरंग हूँ पर तुम्हें अच्छा लगूँ इसलिये नीला दिखाई देता हूँ। मैं जीवों और वनस्पतियों से बहुत प्यार करता हूँ इसलिये उन्हें अपने घर में रखता हूँ। तुम भले ही उसे ज्वार भाटा कहो पर वह मेरा चाँद के लिये उमड़ता हुआ प्यार है। मैं बस देता ही देता हूँ। मुझे मथ कर देखो मुझ में रत्न भरे पड़े हैं। मेरा स्वभाव अभेद है याने सब के लिये एक जैसा। मुझे बंधन की जरूरत नहीं इसलिये अपने खुद के बनाए तटबन्धों में स्वानुशासित रहता हूँ। केमिस्ट्री की भाषा में मेरी देह दो गैसों से मिल कर बना एक रसायन है। हाइड्रोजन जो सारणी का प्रथम तत्व और ऑक्सीन जो तुम्हें जीवित रखने वाला तत्व है।
"हो सके तो सागर बनो!
मुझ से अध्यात्म जानो! मैं सागर हूँ पर झूम इन करके देखो अन्तिम रूप से मैं एक बूँद हूँ। मेरी इस बूँद का विस्तार ही समुन्दर रूप में दिखाई देता है। इस बूँद की शक्ल में मैं हर जीव, जड़ और वनस्पतियों में और हे मानव तुम में भी मौजूद हूँ। मैं यहाँ भी हूँ और वहाँ भी हूँ। "महसूस करो, तुम्हारे भीतर भी हूँ और बाहर भी हूँ।" मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ।
9
तान दो मस्तूल
सूरज ने जुगनुओं को कभी चमकते हुए नहीं देखा। उस ने कभी घोर अन्धकार भी नहीं देखा। वहीं जुगनू ने अँधेरा देखा भी है और उसमें वह रहा भी है। जुगनू उसकी अपनी दुनिया का शहंशाह है क्योंकि अपनी राह ढूँढने के लिये उसने सूरज के उजाले का इन्तजार कभी नहीं किया और न तारों के टिम टिम करते प्रकाश के भरोसे रहा। प्रकृति ने उसके साहस को देखते हुए उदात्त हो कर उसे बिना ईंधन का लालटेन दे दिया है। उसे सुलगाने की चिंगारी भी नहीं चाहिये। प्रकृति ने एक और वरदान उसे दिया है कि वह बिना ताप बढ़े उजाला कर सके। ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे यह कह रही है कि तुम मेरी तरफ दो कदम साहस के चलो तो देखो मैं तुम्हारी तरफ चार कदम चल कर आई हूँ।
एक नन्हा दीपक भी इसी श्रेणी का योद्धा है। वह साहस से भरा हुआ, निर्भय हो कर समर्पण के लिये तैयार है। वह कहता है ''भले ही मैं अपने तले का अन्धकार दूर न कर पाऊँ, मैं अपने चारों ओर उजाला करने के लिये तैयार हूँ।
नचिकेता कठोपनिषद् का महानायक है जो मत्यु के देवता के सामने सहज भाव से अदम्य साहस ले कर खड़ा हो जाता है। उसका यह साहस यमराज को कोई चुनौती नहीं है पर उसे वहाँ भी भय कदापि नहीं है। फिर जो घटित हुआ वह अद्भुत था। नदी किनारे के बड़े मजबूत विशाल वृक्ष बाढ़ में बह जाते हैं पर बेंत का नन्हा सा साहसी पौधा साबुत खड़ा रह जाता है। एक साहस और उत्साह भरा नाविक अरब सागर पार करने के लिये मस्तूल बाँध कर निकल पड़ता है। फिर तो हवाएँ भी यही कहती हैं कि हम तुम्हारी नाव को हमारी शक्ति से चलावेंगी।
"साहस शक्ति का आमन्त्रण और कर्म का आधान और सफलता का प्रथम सोपान है।"
10
'वर्तमान चल रहा है'
कब से ढूँढ रहे हो रत्न? उम्र के कई पड़ाव देखे, कई अवसर मिले पर तुम और बेहतर संभावनाओं के द्वार खोजने में लगे रहे। खोजते खोजते तुम रत्नों की खदान के अन्तिम छोर तक निकल आए हो। तुम्हें कई रत्न मिले भी पर तुम उन्हें बस परखने में लगे रहे, निरस्त करते रहे पर और अधिक बेहतर की खोज में उन्हें रास्ते में ही छोड़ते चले गये। इसलिये कहता हूँ कि अभी भी वक्त है कि जो मिल रहा है उसे अपनी गिरह में रख लो।
जिन्दगी जुआँ नहीं है कि हारते जाओन तो भी बेहतर जीत के चक्कर में खेलते ही रहो। देखो! जितने जुआरी हैं वे कब धनपति हुए हैं? जो क्षण आया है वह अवसर है चूक गये तो समझो तुम चुक गये, जो बीत गया है वह इतिहास है इसे बदलने का सामर्थ्य स्वयं ब्रह्मा में भी नहीं है, जो आनेवाला है वह अन्धे की रेवड़ी है तुम्हारे हाथ लगे न लगे।
हर पल कुछ न कुछ सौगात ले कर आता है और वह तुम्हारे पुरुषार्थ, पराक्रम, समझ और क्रियात्मकता को चुनौती देता है। ये चुनौतियाँ अपने गर्भ में तरह तरह की संभावनाऍं और उपलब्धियाँ भर कर लाई हैं यदि इन चुनौतियों को आफत समझ लिया तो बैठे रह जाओगे। पहली बरसात हुई, अगर किसान बीज लिये खेतों के किनारे बैठा रहा और फिर बीज बोने का वक्त आया वह आसमान तकता रहा तो उसके लिये अवसर लौट कर नहीं आता है। एक बात और है यदि वह फसल बोने से चूक गया तो खरपतवारों को उगने को मौका मिल जावेगा। फसल गई सो गई खेत की सफाई अलग माथे पड़ गई।
"इस उपयोगी वर्तमान को कोरे अतीत के अन्धे गर्त में मत फेंको।"
11
खुद के संग जरूर रहना
संसार गतिमान है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम शून्य में हो। पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे।
आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था।
उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का।
यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।
तुम खुद को भूले तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे।
सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।"
12
अन्तःकरण से जुड़े लोग।
"भद्रं पश्येमाsक्षभिर्यजत्रा"। - अपनी आँखों से अच्छा देखो।
आँखों की पुतलियाँ एक गेट वे है जरूर पर हर किसी को दिल तक जाने नहीं देती। इस एक बारीक से छेद में पूरी दुनियाँ समा लेती है। तुमने कभी ध्यान नहीं दिया इस फर्स्ट गेट के आगे कॉमन हाल है जहाँ तक वे लोग पहुँचते हैं जो तुम्हारे साथ कोई न कोई रिश्ता रखते हैं या वहाँ पर ठहरने के लिये अपना स्थान बना लेता है। यह बहुत बड़ी जगह है जहाँ बहुत सारे लोग समा सकते हैं, रुक सकते हैं, बाहर भी निकल सकते हैं। इस कामन हॉल में कभी कभी बहुरूपिये, मुखौटेबाज, छलिया, और शरारती लोग भी पहुँच जाते हैं और विप्लव मचाते रहते हैं। इन्हें बेदखल करना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें सम्हालने में बहुत सारी ऊर्जा खर्च हो जाती है। ये वायरस की तरह हमारे इम्यून सिस्टम पर ही अटेक कर देते हैं। ये बहुत बलशाली हैं और किसी भी एन्टीवायरस से भी मरते नहीं है पर इनके लिये क्वारन्टीन करने की जगह इसी हाल में रखना पड़ती है। यह हॉल भरता और खाली होता रहता है। फिर इसके आगे एक सिट आउट है यहाँ तक वे लोग आते हैं जो तुम्हारी इजाजत के इन्तेजार में रहते हैं। ये वे लोग है जो तुम्हारी मनोवृत्ति, रुचि अथवा पसन्द की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह सिट आउट इसलिये भी जरूरी है कि यहाँ फिर एक छ्ननी लगानी है। यहाँ से आगे का मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा डेमेजकन्ट्रोल सम्भव नहीं होता है। ये वे लोग हैं जो तुम्हारे जीवन को, विकास को, गिरावट को, मन मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। इस सिटआउट के के बाद एक लिविंग रूम हैं जहाँ तुम इन चहेते लोगों के साथ रह सकते हो, व्यवहार कर सकते हो, आदान प्रदान कर सकते हो। इनके साथ पूरा जीवन साझा करते हो।
सिटआउट से सँटा हुआ सबसे अलग थलग एक गलियारा है जो सीधे तुम्हारे अन्तःपुर में पहुँचता है। अन्तःपुर तुम्हारा अपना अन्तःकरण ही है इसमें जो लोग पहुँच गये उन्हें तुम जन्म जन्मान्तरों का भूल नहीं सकते। ये वे लोग हैं जो तुम्हें और तुम इन्हें अच्छे लगते हो। जरूरी नहीं कि दुनियाँ जान सके कि ये कौन कौन लोग हैं। कभी कभी इसमें रहने वाले सक्ष भी नहीं जानते कि तुम उन्हें एक तरफा पसन्द करते हो। यहाँ देवत्व उतर आवे तो तुम भक्त बन जाते हो, दानव उतर आवे तो विध्वंसकारी हो सकते हो और यहीं अनन्त संभावनाएँ निर्मित होती हैं जो तुम्हारे भीतर बाहर की तमाम गतिविधियों और सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित करती हैं। यह गलियारा तुम्हारे अपने नियन्त्रण में है। यहाँ पहुँचने और रहने वाले लोग सब रिश्तों को लाँघ कर आते हैं और किसी भी प्रकार के बन्धनों-अनुबन्धों से मुक्त रहते हैं। ये इस तरह साथ रहते हैं जैसे आँखों से कान और मुँह सिले हुए हों। ये अगर बाहर निकल भी जावें तो इनकी अमिट स्मृतियाँ वहीं परमानेन्ट बनी रह जाती हैं और तुम इनके वर्चुअल इफेक्ट में रहते हो चाहे वह तुम्हारा गुरू हो, प्रेमी हो अथवा आदर्श हो। इनमें से भी कोई एकाध तुम्हारे संग दूध में घुली मिसरी की तरह रहता है। जिसे वह भी जानता है और तुम भी। वह अलेप है, लोभ आदि सभी विकारों से रहित है। चाहे वह पुरुष हो, प्रकृति हो या परमात्मा हो। इसे तुम से जुदा कोई नहीं कर सकता।
" तुम्हारा अपना अन्तःपुर सिर्फ तुम्हारा है इसे तुम ही अच्छी तरह सम्हालो"।
13
मन का बोझ
मन अमूर्त है, अभौतिक है, अदृश्य है, अश्पृश्य है लेकिन इन्द्रियों का सुरवाइजर, सुपरकन्ट्रोलर है और सुपरसोनिक स्पीड से भी तेज चलता है। करता कुछ नहीं पर करवाता सब है। जलेबी का स्वाद इसे चाहिये तो हाथ, दाँत और जबान को काम में लगा देता है। बेचारी इन्द्रियाँ नाचती है इसके इशारे पर। "नाच नटी इव सहित समाजा।" शरीर का सबसे जिद्दी, सबसे बलवान, सब से कमजोर प्रत्यंग भी यही है, नियन्ता भी यही है। कभी कभी यह बुद्धि को भी परास्त कर देता है, विवेक की भी नहीं सुनता है। कभी एवरेस्ट पर चढ़ा देता है, कभी रस्सी से पंखे पर लटकवा देता है, कभी आँख वाले को अन्धा बना देता है तो कभी आनन्द विभोर कर देता। लेकिन कुछ विशेष गुणों के चलते इसकी चार बड़ी विशेषताएँ ये हैं - वेग, आवेश, आवेग और संवेग।
जरा इन्हें विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में देखें -
वेग- इसे आप गति कह सकते हैं। समय के सापेक्ष्य में किसी की स्थिती के परिवर्तन को 'वेग' कहते हैं। साधारण बोल चाल की भाषा में कहें तो अभी यहाँ तथा कुछ पलों बाद कहीं और। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की गति ही वेग है इसी गुण के कारण इसे वेगवान कहते हैं।
आवेश- इलेक्ट्रीफाइड अर्थात् अपनी न्यट्रल पोजिशन से शिफ्ट हो जाना। जब इसमें कोई नया विचार तेजी से प्रवेश करता है तो इसमें उस विचार के अनुसार प्रबल ऊर्जा संचरित हो जाती है और यह उन्मत्त हाथी की तरह व्यवहार करने लगता है।
आवेग- बाढ़ की तरह बहना। आवेशित हो कर किसी भी दिशा में बेतहाशा दौड़ लगाना आवेग है।
संवेग- इसे मोमेन्टम कहते है। इस स्थिति में मात्रा और गति दोनो एक साथ काम करते हैं।
वेग, आवेश और आवेग को आसानी से समझा जा सकता है लेकिन संवेग इनका समन्वित फल है। एक बार गति पकड़ने के बाद नहीं रुक पाना संवेग है जैसे मोटर सायकल में एक्सीलेटर छोड़ देने पर भी गाड़ी चलती रहती है। और गतिशून्य हा कर न चल पाना भी संवेग है जिसे मोमेन्ट ऑफ इनर्शिया कहते हैं जैसे पार्किन्सन में होता है।
14
कोई आ जाता है कहीं से
जीवन को उत्सव रूप में परिवर्तित करने के लिये कुछ लोग कहीं से आ जाते हैं। जैसे दीपावली में दीपक, रंग और पटाखे आते हैं।
दीपावली उत्साह ले कर आती है। रांगोलियाँ सजती हैं, दीप जलते हैं, पटाखे चलते हैं। इनके बगैर दीपावली एक संवत्सर की तिथि तो है पर उसे उत्सव बनाने वाले ये दीप, रंग और पटाखे अपना सर्वस्व लगाने को तत्पर है। दीप अपना तैल और बाती समर्पित करता है, रंग मनोरमता परोस जाते हैं और पटाखे फूट जाते हैं और दीपावली को एक उत्सव में परिवर्तित कर देते हैं।
इनके बगैर दीपावली एक पर्व तो है पर "उत्सव" नहीं हो सकता। इन्होन हमें उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है। पटाखे फूट गए , रंग बिखर गया और दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी कर्म रेखाएँ तो बची रहती हैं, इनसे हमारे संबंध भी टूटते नहीं हैं। एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने निहित दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते रहे।
इनके पावन उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि किसी हताशा के। यहाँ उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण है। वस्तुतः हमें पटाखों, रगों और दीपों का कृतज्ञ होना चाहिये।
"जो अपना कुछ खो कर भी हमें खुशी देते है हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिये।"
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बहारें फिर भी आएँगी
सूरज चुपचाप आता है जीवन देकर शाम को चला जाता है। चाँद आता है शीतल चाँदनी में नहला कर चला जाता है। ऋतुएँ दबे पाँव आती है अपना दायित्व पूरा कर चली जाती है। परन्तु यह सब क्यों होता है?
एक ऋतु इसलिये जाती है कि दूसरी को आना है। नदी, तालाब, झरने, पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ सब चुपचाप हैं सब अपनी अपनी लय में हैं, सिर्फ सेवा में लगी है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। युवराज इसलिये नियुक्त होना है कि राजा के जाते ही उसे राजा बनना हैं। नदी अपनी धारा लिये बहती है ताकि ऊपर से आने वाले पानी को आने का मार्ग देना है। सूखे पत्तों को शाखा रिक्त करनी है ताकि वहाँ पत्तों की अगली पीढ़ी जन्म ले सके। बीज अंकुरित हो जाने के पश्चात अपना उत्सर्ग करता है ताकि अपने वंश की वृद्धि कर सके, उनकी जगह अगले बीज आ सकें।। ध्वंस, ह्रास, विनाश, क्षरण, परिवर्तन आदि इसलिये भी आवश्यक हो जाता है कि वहाँ अगला सृजन आने वाला है। मिट्टी को इसलिये जलना है कि उसे ईंट हो कर अगला भवन निर्माण करना है। यह विकास क्रम और प्रक्रिया अनन्त काल से अनवरत चल रही है। पशु पक्षी जीव जन्तु सब अपनी अपनी जद में हैं।
इनके परिक्रमण को देख कर निश्चित लगता है कि बहार के बाद भले ही पतझड़ आता हो "बहारें फिर भी आएँगी।"
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अनुमान, अनुभव और संभावनाएँ
बड़े आश्चर्य की बात है कि पतंजलि योगसूत्र में अनुमान को प्रमाण माना गया है।
अनुमान का सामान्य अर्थ है अन्दाजा लगाना। यह अन्दाजा अतीत अथवा भविष्य के किसी आयाम से उठा कर लाया गया संभावित उत्तर है। यह उत्तर अनुभव की आधारशिला पर खड़ा होता है। अनुमान भूतकाल की किसी वास्तविक घटना के समानान्तर रख कर आकलन करता है जैसे नदी में आयी बाढ़ यह बताती है कि नदी की उद्गम दिशा में कहीं तेज बरसात हुई है। वहीं वर्तमान में चल रहे परिदृश्य को देख कर काल्पनिक अथवा वास्तविक अनुभवों के आधार पर की गई गणना भविष्य की किसी संभावित घटना का पूर्वाभास है जैसे कि जिस डाल पर खड़े हो कर उसी डाल को तने की तरफ से काटने पर स्वयं गिर जाना तय है। परन्तु जो घोषणा की गई है वे अपने समग्र अनुभवों का परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन ही है। जितने अनुभव परिपक्व होते है घोषणाएँ उतनी ही सच्चाई के निकट होंगी।
अनुभव तुम्हारी चेतना में परिरक्षित और संचित कोष है। हम तुम और सभी लोग प्रत्येक क्षण किसी न किसी घटना के साक्षी होते हैं। कुछ घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, कुछ हम इग्नोर करते हैं लेकिन कुछ घटनाएँ हमारे अन्तस में जाकर बैठ जाती है जिन्हें हम चाह कर भी भूल नहीं सकते। अनुभव इन्हीं घटनाओं और उनसे जन्य परिणामों का कोष है। पूर्वानुमान इस अनुभव से पकाई गई खिचड़ी है जो पक्वान्न है। वह पक्वान्न जो दाल, चावल, नमक, सब्जियों आदि कई इनग्रेडियेन्ट का समुचित अनुपात में मिलाया गया भेल है। इसे रुचि अनुसार चटखारों से भी तैयार किया जा सकता है। गलत अनुपात अथवा अपरिपक्वता इसे खराब भी बना सकते हैं। खैर जो भी हो हम अपने दैनिक जीवन में यह खिचड़ी रोज बनाते हैं जो हमारे जीवन को, जीवन शैली को और परिणाम को प्रभावित करती है।
"अपने अनुभव और अनुमान से अच्छी संभावनाएँ तलाशें"
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बड़े अजीब थे ये लोग। इन्हे मैं जिद्दी नहीं धुनी कहता हूँ। ये वे लोग थे जो थार के मरुस्थल की ओर चल पड़े गन्ने की फसल उगाने, शैल शिखर को उँगली पर उठाने, तिल को ताड़ बनाने।
तुलसी जो रागी से वीतरागी हो गया। आततायी मुगलों की छाती पर रामचरितमानस लिखने का अद्भुत कार्य किया है जिसने। जैसे मन्दिर में पूजा ओर पुजापा रखा होता है वैसे हमारे घरों में यह पावन, अमर ग्रन्थ रख गया। जैसे वनाञ्चलों में ऋषियों ने ऋचायें गाई वैसी भक्ति की, ज्ञान की, वैराग्य की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उतार गया। उपकृत हैं हम सब।
मन्दिरों में भजन सबने सुने होंगे। राजमहल और रंगमहल के भोग विलास में डूबे वातावरण में भी गोपाल के अनन्य प्रेम में पगी वह विरहिणी मीरा करताल ले कर गाने लगी "मैं तो साँवरे के रंग राची।" जिसकी श्रद्धा और भक्ति के प्रताप से विष भी प्रिय का प्रसाद बना होगा। उसकी गिरधर के विरह में की गई पुकार जन जन की अभ्यर्थना और अर्चना का मन्त्र बन गई। वह तरी और कईयों को तार गयी।
वह रैदास मरी खाल को सीते सीते कह गया कि हे परमेश्वर "तुम चंदन हम पानी" और घुल कर अपनी वह खुद ही घुल कर सुवास जन जन में छोड़ गया।
उस कबीर ने तो हद ही कर दी। उपनिषदों में वर्णित तुरीय को अपने करघे में लगे तानों बानों में बुन गया। ऐसी चादर बुनी कि बेदाग-बिंदास जैसी की तैसी धर गया। सत्य का निर्भीक पुजारी था वह।
और वह सूर बिन आँखों के ही विराट का दर्शन करते करते भक्ताकाश का सूरज बन कर चमक गया। उसकी प्रज्ञा तो चर्म चक्षुओं से परे मनश्चक्षुओं से ऐसा देखती थी कि कोई क्या देखेगा। उस धुनी ने असंख्य पद ऐसे गाये कि उसके 'सूरसागर' के सुरसागर में डूबने को मन करता है।
ये वे लोग थे जो पानी की उल्टी धार में टूना मछली की तरह तैरे और मिसाल छोड़ गये। उन्हें पता ही नहीं होगा कि जिन पगडण्डियों पर से गुजरे वे इस संसार के जन जन के लिये पुण्यशील राजपथ हो गये हैं।
"हो सके तो तुम भी ऐसी एक नन्ही सी पगडण्डी ढूँढ लो!"
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हमारे मन को कौतुहल पसन्द है। यह सीधे सरल पानी में जैसे जोंक टेढ़ी चलती है मन वैसा टेढ़ा टेढ़ा चलता है। इसलिये ही शायद आज़ाद रिश्तों में हम बंधन ढूँढते हैं और बंधे रिश्तों से आज़ादी चाहते है। है न बड़े आश्चर्य की बात? हम बाजार से चमचमाती जंजीर ले आते हैं तो हमें उससे मोह होना स्वाभाविक है। फिर तो इन जंजीरों से मोहब्बत होने से हमें कोई छुटकारा नहीं दिला सकता।
एक आदमी ने तोते का चूज़ा पाला उसे सुनहरे पिंजरे में रखा बड़े प्यार से उसे पिंजरे में खाना पानी देने लगा। धीरे धीरे तोता बड़ा हो गया। एक दिन तोता पिंजरे से बाहर आ गया। आसपास कोई नहीं था, दरवाजा खुला था। वह चल कर दहलीज पर आ कर देखता है। बाहर खुला आसमान है। आम, अमरूद, सेब पेड़ों पर लटके हुए हैं। उसे लगा यह सब नकली है। वह केवल यही जानता था कि असल में ये वस्तुएँ पिंजरे में ही पायी जाती है। वह फिर पिंजरे में लौट आया। जैसे तोता पेड़, पौधे, आकाश आदि से अपने मूल रिश्ते को अनावश्यक और बन्धन के रिश्तों को जबरजस्ती अपना मूल रिश्ता समझ लेता है। हम भी सब वही कर रहे हैं। ऐसे में हमें हमारी इसी प्रवृत्ति के लोग मिल जाते हैं, जैसे करेला नीम पर चढ़ गया हो।
बन्धे को बन्धा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय॥
जंजीरों में वह भी बँधा है और मैं भी। हमें निर्बन्ध चाहिये?
यह मनोयोग नहीं मनोदशा है, भटकन है। हम न तो हल ढूँढते हैं और न आज़ादी।
हम अपने भीतर के पावन रिश्तों से आजादी चाहते हैं क्योंकि हम भीतर के आज़ाद रिश्ते से बेखबर घूम रहे हैं। हम जगत में अपने बनाए कई रिश्तों के बन्धन स्वीकारते हैं पर भीतर के आज़ाद रिश्ते नहीं पकड़ते। भीतर के रिश्तों की अनुमति किसी से नही लेनी पड़ती इसलिए ही इस रिश्ते को आज़ाद कहा है।
"मैं जो हूँ बस मैं ही हूँ"।
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जिन्दगी तेरी मेरी कहानी
जीवन अनगिनत छोटी छोटी कथाओं का एक चलता फिरता उपन्यास है। वक्त के कई मोड़ आते हैं, लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं, फिर फिर मिलते हैं। हर एक के साथ कोई न कोई कथानक, कोई संवाद, कोई याद जुड़ जाती है। कोई कुछ लेता है तो कोई कुछ देता है पर इनमें से कोई खास सक्ष ऐसा भी जीवन में आ जाता है जो न कुछ लेता है न देता है। जो अटूट नाता जोड़ कर दूध में मिसरी के तरह हमारे दिल दिमाग में बैठ जाता है। रिश्ते हम बनाते हैं पर नाता ऊपर वाला बनाता है। यह खास नातेदार जब आसपास होता है तो मन आनन्द विभोर हो जाता है, दूर जाता है तो लगता है तो जैसे शरीर से कोई अंग कट गया है। इन नातों के बिना क्या अपने जीवन की कहानी पूरी हो सकती है? ये अध्याय हमने नही जोड़े हैं पर अगर ये जुड़े नहीं होते तो पूरा जीवन व्यर्थ हो जाता। इसलिये जीवन इसी समग्रता का कन्सोलिडेटेड पैकट है। इसे खोल कर देखेंगे तो दिखेगा हम इनके कारण क्या से क्या हो गए हैं।
बचपन में हम दादी माँ से कहानी सुनने की जिद करते थे तो उनका मूड न हुआ तो वह एक संक्षिप्त वाक्य की कहानी सुनाती थी- "एक था राजा एक थी रानी, दोनो मर गए खतम कहानी।" अगर खूबसूरत नाते ना जुड़े होते तो हमारी सुनी उस दादी माँ की संक्षिप्त कहानी की तरह जीवन को ही छोटा सा ही रह जाता।
"चलो याद करें हमारी अपनी वह कहानी जो अपने जीवन के मूल्य समझाती हो।"
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विकास, वैभव और विकार
विकास का सामान्य अर्थ है 'बढ़ना'। बेहतरी की ओर बढ़ना। पर हमने केवल आराम के संसाधनों के इकट्ठा हो जाने को विकास मान लिया है और इनसे इतना अधिक घिर गये कि इन के मेनेजममेन्ट में ही सब से अधिक व्यस्त रहते हैं।
विभव
और तो और हम इन संसाधनों के उपयोग के लिये जबरजस्ती दौड़ते फिरते हैं जैसे कि - गाड़ी खरीदी तो चलाना है, टीवी खरीदा तो देखना है, साउण्ड सिस्टम खरीदा तो सुनना है, फ्रिज में शर्बत ला कर रखा है तो पीना है।
इनकी ऐशगाही से बचने का एक बहुत ही सरल सा उपाय है-'अपरिग्रह' अर्थात् जीवन के लिये जितनी कम से कम आवश्यकता है उससे अधिक इकट्ठा नहीं करना है। एक अजीब सी मानसिकता हम में घर कर गई है कि मेरे पड़ोसी के स्टेटस से मेरा स्टेटस बड़ा हो। यह एक बड़ा मानसिक विकार है। इकट्ठे किये गये इस माल-असबाब को हम 'वैभव' कह रहे हैं। ये सब हैं तो हम विकसित और वैभवशाली हैं।
विकार
विकार को अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो यह एक नैसर्गिक नियम है। किसी भी वस्तु के मूल स्वरूप में अच्छे या बुरे 'परिवर्तन' को ' विकार' कहते हैं लेकिन स्वभाव और व्यक्तित्व के ऋणात्मक परिवर्तन को प्रायः हम 'विकार' कहते हैं। यह विकार उत्पन्न ही न हो इसका पक्का उपाय है। आपके जीवन का विकास, विभव और विस्तार सम्यक् हो इसका मूल मन्त्र है - 'तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु'। अपने संकल्पों को जिस दिशा में ले जाएँगे हमारा जीवन और व्यक्तित्व धीरे धीरे उसी दिशा में चलता जाएगा। "कभी नहीं तो अभी सही," अर्थात् इसी क्षण से अपनी दिशा में आवश्यक सुधार कर के शुभ संकल्पों का प्रारंभ करें। तो चलो! आज की सुबह फिर नया अवसर ले कर आई है।
"संकल्प ही जीवन की दिशा है, जो हमारे अन्तःकरण का फैसला है।"
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मैं अगर मुट्ठी बन्द रखूँ तो न किसी को कुछ दे सकता हूँ, न ही कुछ भी ले सकता हूँ। मन में कुण्ठा बसी हो तो भी ऐसा ही होता है। बँधी हुई मुट्ठी संख्या में तो एक है पर जब मुट्ठी को खोल कर देखता हूँ तो मुझे खुली खुली नर्म और लचीली पाँच उंगलियाँ दिखाई पड़ती है। उनके पोर पोर दिखते हैं, हाथोँ की रेखाएँ दिखाई पड़ती है। ध्यान से देखता हूँ तो आश्चर्य होता है कि ये सब मेरी अपनी मुट्ठी में ही बन्द था। मुट्ठी खुलने पर एकदम से लगता है अपने इस हाथ में अब काम करने की क्षमता आ गई है। जैसे कर्मक्षेत्र के बहुत से द्वार खुल गये हैं।
ये बात अलग है कि बन्द मुट्ठी और खुले हाथ
अलग अलग बातों के प्रतीक हैं। बन्द मुट्ठी संकल्प का संकेत है, शक्ति का आह्वान है, प्रतिज्ञा का बोध है, दृढ़ता का प्रदर्शन है और अगर बन्द मुट्ठी आकाश की ओर ऊपर उठ जाने तो वह "महा उद्धोष" है। वहीं खुले हाथ कर्म का संसाधन है, जुड़ने का साधन है, आत्मीयता का आह्वान है। हाथ किसी की पीठ पर रख दें तो उसमें उत्साह और ढाढस पैदा हो जाता है। यही हाथ टोकनी से फूलों को उठा कर किसी को दे देता है तो खुद भी महक उठता है। यही हाथ किसी और हाथ से मिलेगा तो "मैं से हम" हो जावेगा। मैं से हम की यात्रा व्यष्टि से परमेष्ठि की यात्रा है। तब मेरा यह हाथ राष्ट्र का निर्माण करेगा, चरित्र का निर्माण करेगा, पुरुषार्थ के नये नये तीर्थों का सृजन करेगा।
"बँधी मुट्ठी और खुले हाथ संकल्प और श्रम के प्रतीक हैं।"
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यही एक पल है
पहले मुर्गी आयी कि अण्डा? प्रश्न नहीं है पहेली है। पहेली बूझी जाती है। शायद यह पहेली अबूझ है। अगर ये प्रश्न होते तो उत्तर की संभावना होती मगर यह तो पहेली है। पहेलियाँ खेल है, कौतुहल है, समय बिताने का जरिया भर है।
एक बार इस अण्डे और मुर्गी वाली पहेली पर लम्बी चर्चा हुई। एक कुटिया में ज्ञानियों में बहस छिड़ी तर्क हुए, वितर्क हुए कुछ कुतर्क भी हुए। लम्बी बहस में कोई नहीं जीत सका, सब के सब हारे। पास ही मुर्गियों के चूजे घूरे के ढेर पर नाच-कूद रहे थे, आनन्द मना रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि ये सारे ज्ञानी लोग मिल कर हमारी ही उत्पत्ति की गंभीर चर्चा में खोये रहे। पर चूज़े जीवन के उन पलों को गवाँना नहीं चाहते थे। चर्चाकार यदि उन अण्डों की चर्चा को छोड़ कर उनसे उत्पन्न इस वास्तविक जीवन का दर्शन करते, उसे दौड़ता-भागता, अठखेलियाँ करता हुआ देखते तो वे भी धन्य हो जाते।
ऐसे अतीत के सूखे पहाड़ को खोदने में बस गार्बैज ही निकलना है। तुम्हें पता नहीं है कि वर्तमान सरपट दौड़ रहा है। जो भी है, बस यही एक पल है। क्यों इसे उस गार्बैज में धकेल रहे हो। इन पलों प्रकाश भी है अँधेरा भी है, आनन्द भी है आहें भी हैं। चुनाव तुम्हें करना है। विकल्प कई हैं संकल्प एक ही हो सकता है। दशाएँ जो भी हों दिशा तुम्हें ही चुनना है।
ये पलों के चूजे कह रहे हैं –
"इससे पहले कि यह पल बीत जाए, इसे उत्सव बना लो।"
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जीवन के अभीष्ट
कहते हैं पानी को स्वतन्त्र छोड़ दिया जावे तो वह खुद अपना तल ढूँढता है पर इसके लिये नीचे की ओर ही बहता है। इसमें पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण काम करता है। परन्तु इसका अपवाद भी मौजूद है। पौधे में यह ऊपर चढ़ता है। दिये की बाती में तेल ऊपर चढ़ता है। बरसात में जब नदियाँ तेज बहती है तो हर चीज दौड़ कर सागर की ओर जाती है परन्तु मछलियाँ सागर से उल्टी धार में चढ़ कर आ जाती हैं। कहने को तो हम यह कहते हैं कि पंछी आकाश में उड़ते हैं पर वास्तव में तो वे हवा में उड़ते हैं। ये पंछी चाँद पर नहीं उड़ सकते क्योंकि वहाँ आकाश तो है पर हवा नहीं।
परन्तु ध्यान से देखें तो जो स्थितियों और परिस्थियों के साथ बिना प्रयास बहता है वह सिर्फ बहता है। वहीं जब पुरुषार्थ इसके साथ जुड़ जाता है तो परिणाम बदल जाते हैं। पौधे में पानी ऊपर उठता है तो पौधे का जीवन चल पड़ता है। दिये में ऊपर बढ़ता तेल दिये के जीवन के उद्देश्य को सार्थक करता है। मछलियों का खारे पानी से निकल कर मीठे पानी का घर मिल जाता है। पंछी अपनी आजीविका और चर्या के लिये आधार पा लेते हैं।
"पुरुषार्थ से प्रकृति की विषम परिस्थितियों पर विजय पा सकते हैं।"
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क्या और कितना जरूरी है?
यह प्रश्न जीवन के मूल प्रश्नों में से एक है। लेकिन इसी प्रश्न को थोड़ा व्यापक बनाना होगा।
जरूरतें न हो तो जीवन की कल्पना व्यर्थ है पर 'क्या क्या जरूरी है?' कितना जरूरी है? इस पर थोड़ा चिन्तन करना चाहिये।
क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जो उस पानी के लिये दौड़ता है जो कि वास्तव में प्यास बुझाने वाला पानी ही नहीं है। उसकी वह दौड़ सिद्ध कर देगी कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं।
मटेरियलिज्म अर्थात् दुनिया का बाजार यह कहता है कि अपनी आवश्यकता को सीमित करने का विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय का शाश्वत तथ्य है। परन्तु आवश्यकता कम रखने का सिद्धान्त इसे कहाँ मना करता है। आवश्यकता की आपूर्ति के लिये कतई मनाही नहीं है पर जब हमें पता है कि "अल्टीमेट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है" तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों? इस महावाक्य के पीछे डिटर्जेन्ट बेचने वाले का बाजारवाद छिपा है। बाजार आपका इमोशनल एन्केशमेन्ट चाहता है।
प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात ही करता है। एक पेड़ ने कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है आओ हम खुशबुएँ लेकर चलें और संसार को सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े है अपने अपने संयम से। कोई भी अतिक्रमण नहीं करता। पंछी आज सुबह उड़ेगा और जब घोसले में लौटेगा तब उसके अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। कल वह फिर अपनी भूख के अनुसार अपना पेट भरेगा।
हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की क्रम को ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोष नही। उल्टे हमें तेज और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो ही बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
।।श्रीमद्भगवद्गीता।।
इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर ली इससे अपने मनोरथ को प्राप्त कर लेंगे।
"थोड़ा है थोड़े की ही जरूरत है, जिन्दगी खूबसूरत है।"
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"प्रेम पूर्णता ही में है"
*क्या एक दिन का प्रेम 'प्रेम' है?, तो क्या दिन गया तो प्रेम गया?, लव इज गॉड तो क्या बन्धन टूटते ही गॉड..? नहीं प्रेम है ही नहीं यह। प्रेम के लिये शास्त्र चाहिये? अवसर चाहिये? याकि कुछ और? यदि ऐसे प्रश्न खड़े हों तो जरूर हम से कहीं चूक हो रही है।*
प्रेम करते हो तो थोड़ा या अधिक नहीं होता। प्रेम का परिमाण भी नहीं हो सकता। प्रेम करते हो तो बस प्रेम करते हो। जिस व्यक्ति से प्रेम करते हो उसे सम्पूर्ण रूप से स्वीकारते भी हो, उसमें ऐसा नहीं हो सकता है कि अमुक बात ठीक है इसलिये ही प्रेम करते हो। यदि आंशिक रूप से स्वीकारते हो तो "प्रेम" नही कोई और नाम ही दे देना।
प्रेम करो तो दूध और पानी के मिलन सा, मछली और पानी जैसा, जल से कमल जैसा, फूल से गन्ध जैसा। बस गड्ड-मड्ड हो कर। अपनी कामना यहाँ तक कि चाहना भी प्रेमी पर आरोपित नहीं की जा सकती। *"प्रेम नैसर्गिक एकत्व का पर्याय है।* इसलिये प्रेम करो तो बस प्रेम करो। प्रेम मंछ तर्क नहीं तमीज़ चाहिये। *प्रेम में बस प्रवेश का मार्ग है इसमें एक्जिट नहीं है यदि एक्जिट हो गया तो वह प्रेम नहीं है* इसे अपनी सुविधा से कुछ और नाम दे लेना। प्रेम आवेग, आवेश, नशा अथवा अन्धत्व तो कतई नहीं है। इनमें से कोई एक भी लक्षण दिखाई दे तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम बन्धन और मुक्ति दोनों नहीं है क्योंकि इसमें परिधि अथवा सीमा नहीं है इसलिये बन्धन का प्रश्न ही नहीं है। प्रेम अपने आत्मिक आनन्द से सीधा सीधा जुड़ा है इसलिये *प्रेमी और प्रिय आत्मानुभूति से सीधे अद्वैत में होते हैं। अद्वैत में दूसरा होने का स्थान नहीं है।*
लोग प्रेम की परिभाषा में जीवन खपा देते है जबकि कुछ लोग ऐसा प्रेम करते हैं कि उनका नाम ले कर प्रेम का परिचय देते हैं। जैसे..।इसलिये प्रेम में पड़ोगे तो वह आत्मानुभूति में आ जावेगा, जान जाओगे प्रेम क्या होता है। गुड़ की मिठास पोथियों से नहीं चखने से पता होगी। क्या तुमने चखा नहीं है? अपने व्यसन के लिये यदि मैने फूल को डाली से तोड़ा नहीं है तो मैं फूल से प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं उसके सौंदर्य से, सुवास से, उसकी वहाँ उपस्थिति से और उसके जीवन से प्रेम करता हूँ।
*"प्रेम करो तो विशुद्ध, विशद प्रेम करो।"*
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मन की शक्ति और संकल्प
कलाकार, कवि, लेखक अपने सृजन के समय हमेशा अकेला होता है। लेकिन इस अकेलेपन में वह अपनी कल्पना, घटना के देश, काल और परिस्थिती में एकात्म भाव प्राप्त कर लेता है।
शिल्पकार के हाथ में हम केवल छैनी हथौड़ा देखते हैं, उसका शारिरिक श्रम देखते हैं, आड़ी तिरछी, हलकी भारी चोंट देखते हैं और उस पत्थर का उलटता पलटता देखते हैं लेकिन हमें वह दिखाई नहीं देता जिससे वह पत्थर के भीतर जा कर इच्छित आकार ढूँढ कर लाता है। उसके उस ढूँढते हुए मन को हम नहीं देख पाते। कवि, लेखक कलम उठाता है, लिखता है तो कागज, कलम और उसकी भाव भंगिमाओं तक ही हम देख पाते हैं परन्तु उसके मन में उठती गिरती संकल्पनाओं को हम देख नहीं पाते। एक कुम्हार मिट्टी का लौंदा उठाता है, चाक पर रखता है, चाक घुमाता है। उसके हाथों को कोई अदृश्य अनुदेश मिलते हैं और मिट्टी आकार लेने लगती है। ये अनुदेश कुम्हार के मन में बने आकार का प्रतिरूप लेने लगता है। चाहे वह घड़ा हो, चिलम हो या गमला हो। यह बात तो तय है कि आदमी का मन दूर दूर कहीं जाता है और बिना अपनी आँख उसके साथ भेजे भी देख कर आता है। सृजन के लिये फिर एक संकल्प करता है और एक कृति का जन्म होता है।
वेद कहता है-
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥
अर्थ: जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान् मन सुषुप्ति अवस्था में होते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूरतक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।
स्पष्ट है कि हिमालय का विहंगम चित्र कैनवास पर उतारने के पूर्व मन वहाँ संकल्पना में जाता है और तब कलाकार उसका प्रतिरूप कैनवास पर उकेरता है। शिल्पी फूल पत्तियों का शिल्प तैयार करने के पूर्व मन को वहाँ आकार ढूँढने भेजता है और उसका डुप्लीकेट पत्थर में से ढूँढ लाता है। कवि परकाया में प्रवेश करता है। अगर पुरुष नायक की तरह लिखता है और नायिका का सौंदर्य चित्रण करता है तो अपने मन के माध्यम से उस देश, काल, परिस्थिति में तादात्म्य स्थापित करता है और ऐसा शब्द-चित्र तैयार करता है कि पढ़ने वाला पाठक यह समझ नहीं पाता है कि यह सब उसे कोई बता रहा है या वह साक्षात् स्वयं देख रहा है।
यह जो मन है न यह अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य वाला है। विचार कर देखो हम आज वैसे ही हैं जैसा जैसा मन ने चाहा है। जिसने अपने मन को जो दिशा दी, जो संकल्प लिये हमारे कृतित्व और व्यक्तित्व उसी दिशा में चल पड़े।
"अपने शक्तिशाली मन को शुभसंकल्प प्रदान करें।"
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मन में लगी फाँस
काँटे पैरों में लग जाए तो निकाल दोगे पर उनकी नोंके टूट कर वहीं रह जाए तो वे 'कीलें' बन कर शरीर का हिस्सा बन जाती है। अब वे सफ़र के अलावा भी चिर संगी हो गईं हैं। पहले किसी और साबुत काँटे से यह फाँस निकल सकती थी पर अब निकालना है तो इसे अब आपरेशन कर के निकालना पड़ेगी।
तुम्हारे लिये सब तरफ राजपथ या पेरिस की तरह काँच की सड़क नहीं बिछी पड़ी है। यह मत सोच लेना कि सुख ही सुख आवेंगे, दुःखों से बचे रहोगे। दिन है तो रात भी है, प्रकाश है तो अन्धकार भी है, उल्लास है तो क्षोभ भी है।
जिन्दगी एक सफर है। यह सफर पहली से अन्तिम साँस के बीच लगातार चलते रहने का है। बिना चले रहा नहीं जा सकता। यहाँ रास्ते में कुछ फूल भी हैं पर काँटे अधिक हैं।
आदमी तो आखिर आदमी ही है। सफ़र जिंदगी है काँटे दुःख है, उसके आस-पास दुनिया के रिश्ते ही रिश्ते हैं। कुछ भले रिश्ते हैं पर कुछ रिश्ते जिन्दगी की राह में काँटे बिखेरते रहते हैं।
गोस्वामी जी ने तो रामकथा लिखने के आरम्भ में दोनों रिश्तों को प्रणाम किया है-
"बंदउँ संत असज्जन चरना।
दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना।।"
"उपजहिं एक संग जग माहीं।
जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।
सुधा सुरा सम साधु असाधू।
जनक एक जग जलधि अगाधू।।"
कुछ काँटे पैर में चुभ कर निकल जाते हैं पर टूटी हुई फाँसें भीतर घर कर जाती हैं। ये फाँसें पड़ी पड़ी 'कील' बन जाती है। चलते-चलते ऊँची नीची जगहें आती है तो पाँव में पड़ी 'कील' दर्द करने लगती है उसी तरह विषमताओं में कष्ट उभर आते हैं।
लेकिन एक स्थित इससे भी विचित्र है। काँटा लग जाने पर जो कष्ट होता है वह तो ठीक है लेकिन जब काँटा लगा ही नहीं है तब उसकी आशंका में जीना उधार का दुःख है। वह दुःख जो अभी दुःख आया ही नहीं है उसके संशय को मन तक गहरा ले जाना स्वयं के साथ अन्याय है और इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है। "संशयात्मा विनश्यति"।
हर हाल में चाहे जो भी हो यह समझ लो कि -
"संसार में कई दुःख हैं पर उन्हें मन की कील मत बनने दो।"
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जीवन सवाँरें
उस बड़े कुम्हार का चाक चल रहा है। हम इसे चलना कहते हैं असल में तो चाक घूम रहा है। सदा से घूम रहा है। घूमता ही रहेगा। हम सुबह घूमने जाते हैं तो वास्तव में हम घूमते नहीं है वहाँ चलते हैं। परन्तु इन दोनों में एक बात तो पक्की है कि हम जहाँ से चलना शुरू किये थे वहीं फिर लौट कर आते हैं।
इस जीवन के चाक पर चढ़े हम भी घूम रहे हैं। तुम भी घूम रहे हो, सभी घूम रहे हैं अर्थात् चल रहे हैं। सम्पूर्ण प्रकृति चल रही है, आदमी चल रहा है, जीव जन्तु चल रहे हैं। पेड़ अंकुरण से चल कर आया है और बढ़ता जा रहा है, नदी अपने उद्गम से चल कर आयी है और समुद्र की ओर मुँह कर के बह रही है, आज सुबह दिन भी रात के गर्भ से निकल कर आया है और अस्ताचल की ओर चल रहा है।
हम सब उस सबसे बड़े चाक चलाने वाले कुम्हार की चाक पर चढ़े हैं और चल रहे हैं, चलते ही जा रहे हैं। भूख प्यास ले कर चल रहे हैं, नींद और जाग ले कर चल रहे हैं, कर्म और धर्म लाद कर चल रहे हैं, कोई कोई तो जीवन को सिर पर ढो कर चल रहे हैं। घर से चल कर फिर घर लौट रहे हैं।
तो सुनो! चलाने वाला कोई भी हो तुम्हें चलना है यह पक्का है। चलना एक अभिक्रिया है। तुम खुद को चाक पर चढ़ी हुई मिट्टी की तरह जान लो। यह अच्छी तरह समझ लो कि तुम्हें गलना है, कुम्हार की चेतना और उसकी उँगलियों के इशारों से ढलना है, फिर धूप में बैठ कर अपनी संचित नमी को आलस्य की तरह छोड़ना है और फिर अपने आकार को बरकरार रखने के लिये तपना है। अगर यह सब नहीं हो सका तो कुम्हार तुम्हें वापस उसी मिट्टी में डाल देगा पूरी प्रक्रिया दोहराने के लिये। तुम्हें मटका, सुराही, दीपक जैसा कोई नाम नहीं मिलेगा। तुम अगर ठीक बन गये तो वही कुम्हार रंगों से खूबसूरत बना देगा। तुम खुद को भले नहीं देख पाओ यह जगत तुम्हें बड़े प्यार से देखेगा, अपने माथे पर बिठा लेगा। मिट्टी से चल कर आज तक के आकार में आने का नाम ही संस्कार है। बिना संस्कार के कोई अच्छा आकार नहीं मिल सकता। बिना समिधा के हवन नहीं होते। समिधा पुरुषार्थ है। आहुतियाँ कर्म है। करते रहना धर्म है। चलना ही अभिक्रिया है।
"तो क्या तुम तैयार हो इस सम्पूर्ण अभिक्रिया से सहर्ष गुजरने के लिये?"
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मेरा परिवार समग्र है
परिवार वृक्ष की तरह की एक नैसर्गिक प्रणाली है। इसे समझने के लिये हमें शुरू से आखिर तक देखना होगा।
वृक्ष एक बीज का व्यवस्थित विस्तार है। वह बीज अपने वंश के एक वृक्ष से आया है। वह अपने समस्त गुण-अवगुण, कार्य-अकर्म, अवस्था-व्यवस्था, रूप-अरूप आदि कई प्रतिमान साथ में ले कर चला है। जब वह जमीन में पड़ेगा, अंकुरित और विकसित होगा तो अपने पूर्वजों की तरह का स्वरूप को प्राप्त करेगा। साथ ही यह भी सच है कि चीड़ हिमालय पर उगता तो ठीक था वह मरुस्थल में उगा तो क्या कर पाएगा? बबूल में गुलाब जैसे फूल नहीं आ सकेंगे। करेले की जड़ में गन्ने का रस डाला जावे तो भी वह अपनी मूल कड़वाहट को नहीं छोड़ पाएगा।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात हमें विशेष नोट करनी है कि "सम्पूर्ण पेड़ अपने अवयवों की एक दूसरे पर आपसी निर्भरता बनी हुई है।" जड़ वृक्ष को जमीन से जोड़ती है और भोजन-पानी देती है। जमीन के ऊपर तने से काट दें तो जड़ें जमीन में पड़ी पड़ी सड़ जावेगी। तना बाकियों को ले कर खड़ा है और भोजन प्रवाह का चेनल है। शाखाएँ पत्तियों, फूलों, फलों को पकड़े खड़ी हैं और जीवन रूपी रस का संचार भी करती है। पत्तियाँ सब के लिये भोजन बनाती हैं और अन्त में फल पैदा होता है। फल में अपनी वंशावली के बीज अगली परिवार वृद्धि के लिये होते हैं। हरेक अंग स्वतन्त्र रूप से अपना अपना कार्य करता है।
अन्त में फल में बैठा बीज अणु से भी महीन अगली पीढ़ी का वृक्ष को अपने गर्भ में छिपा कर निकल पड़ता है।
इस प्रणाली को परिवार रूपी वृक्ष से जोड़ कर देखते चलें।
स्वे स्वे कर्मणा संसिद्धि लभते नरः।
जो जहाँ है वहीं से अपने अपने नियत कर्म करता रहे तो परिवार संपूजित यज्ञ हो जावेगा। जो जो इस परिवार के जीवन को सम्बल देते हैं वे हमारे ही परिवार के सदस्य हैं, मित्र हैं। इस एक वृक्ष का होना हर अंग का, हर सदस्य का अपने अपने स्थान पर से किये गये समग्र प्रयास का ही फल है।
"अपने समग्र परिवार में अपना योगदान देने को तत्पर रहें।"
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मुझे खुशी है
मेरी कुछ आदते बड़ी अजीब सी हैं। एक दिन मैं गडरिये की तरह हुर्र हुर्र करता हुआ यों ही एक उबड़ खाबड़ पहाड़ी से गुजर गया। मुझे अच्छा लगा तो फिर रोज रोज वैसे ही उसी जगह से गुजरने लगा मैंने देखा कि रोज रोज उसी राह से गुजरने से मेरी अपनी एक पगडण्डी तैयार हो गई है। मेरा तो यही राजपथ है। इसलिये भी कि इस पर चल कर मैं अन्य लोगों पर ध्यान नहीं जाता, खुद को अच्छी तरह देखता हूँ। आस पास मौजूद पेड़ पौधों को, कलरव करते पंछियों को, पोखरों के किनारे टिटहरियों को टिटियाते हुए देखता हूँ, सुनता हूँ। बड़ा सुकून महसूस होता है मुझे। तब से मुझे राजपथ से अधिक पगडण्डियाँ अच्छी लगती है।
मैं बहुत से दोस्तों को थोड़ा थोड़ा समय देने के बजाय अपने थोड़े से दोस्तों को बहुत सारा समय देना चाहता हूँ। मैं किसी में प्रेम को ढूँढना नहीं चाहता वरन् उस में ही प्रेममय हो कर खो जाना चाहता हूँ।
मेरे जीवन में कुछ वाक्य ऐसे सुनने को मिले जो वास्तव में बहुत छोटे-छोटे से थे पर उन्होंने मेरी जिन्दगी को अहम मोड़ दिये हैं।
राह के पत्थर से ठोंकर लगने पर मैं पत्थर पर गुस्सा करने के बजाय अपनी लापरवाहियों से रूबरू होना पसन्द करता हूँ। मेरी ठोंकर से आहत होने पर भी उस पत्थर के मौन रहने को प्रणाम करता हूँ। वह राह में चलने के लिये मुझे सावधानी बरतने का पाठ पढ़ाता है। इस तरह की किसी घटना का स्मरण कर के मैं रोमांचित हो जाता हूँ और फिर मैं उसके प्रति कृतज्ञ हो जाता हूँ।
मैं अपनी चलती हुई कलम को देख कर प्रसन्न हूँ कि यह अपने उगले हुए रंग से मेरी बातों को, भावों को, विचारों को कागज के सीने पर लिख डालती है। कलम युगों युगों से लिखती चली आ रही है। विलक्षण है कलम जो स्वयं को छोड़ कर सब कुछ लिख रही है, लिखती ही जा रही है। तलवार से तेज धार है इसकी। यह प्रेमी को पिघला सकती है। रोतों को हँसा सकती है। मेरी यह कलम आपके और मेरे बीच सेतु का काम कर रही है। मैं इसका भी कृतज्ञ हूँ।
"खुशियाँ यहाँ, वहाँ, कहीं भी मिल सकती है, तलाश जारी रहे।"
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जरा अपनी भी सुनो
किसी शायर ने कहा है--
ख़ुद ही बनाते हैं हम पेचीदा ज़िन्दगी को
वर्ना तो जीने के नुस्ख़े आसान बहुत हैं।
पानी का एक जीव होता है "जोंक"। एक तरह का पेरासाइट जो जानवरों की चमड़ी से चिपक कर खून चूसता है। जमीन के रास्ते राजपथ होंगे, गडार होगी, पगडंडियाँ होंगी, ऊँचे नीचे होंगे, टेढ़े मेढ़े होंगे पर एकदम सीधे नहीं होंगे लेकिन पानी में रास्ते सीधे हैं, सपाट हैं। जोंक इस पानी में भी सीधी नहीं चलती। रामायण की पात्र मंथरा ऐसी ही थी। उसके इस स्वभाव ने एक विचित्र चरित्र गढ़ दिया। पूरी रामचरितमानस में उसके जैसा अन्य कोई पात्र नहीं। वह मात्र एक परिचारिका थी। पर उसके इस चरित्र ने एक सशक्त राजतंत्र की चूलें हिला कर रख दी, एक परम आदर्श परिवार की इकाइयों को खण्ड खण्ड करने का सारा ताम-झाम इकट्ठा कर दिया। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। विदूषी महारानी कैकेयी ने मंथरा की कही बातों पर विश्वास कर लिया। कैकेयी का चरित्र ममता, त्याग, कूटनीति, धर्मनीति की गहनता का चरम था इसके बावजूद रानी भरम में आ गई।
हमारा मन और बुद्धि एक लय में न हो तो ऐसा हो जाना संभव है। हमारा पेचीदा मन संकल्पनाओं, सम्भावनाओं, संवेदनाओं का अपरिमित संसार ले कर चलता है। जैसे रथ का सारथि लगाम के माध्यम से घोड़ों को नियन्त्रित करता है उसी तरह हमारी बुद्धि तर्क, विश्लेष्ण, संस्लेषण और चुनाव के माध्यम से मन को ताकत और दिशा देती है। बोल चाल की भाषा में हम इसे सूझ बूझ से काम लेना कहते हैं।
हमारे इस मानव शरीर में देव भी बसते हैं और दानव भी। दानव सारे विस्फोटक हैं परन्तु इन्हें बाहर की आग सुर्रियों से ही पहुँचती है। कहते है पराखे में एक सुर्री होती है। आग इसी के माध्यम से पटाखे में पहुँचती है और विस्फोट भी तभी होता है।
"अन्तर की आवाजें ध्यान से सुनो तब कोई निश्चय करो।"
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'बाहर भीतर का रूपान्तरण'
कुछ बच्चे खाली खेतों के मैदान में खेल रहे थे। अलमस्त, स्वाभाविक, निश्चिन्त हो कर। रास्ते से नौटंकी की नाटक खेलने वालों की एक बैलगाड़ी गुजरी। रास्ते में उसमें से कुछ सामान गिर गया। गाड़ी आगे निकल गई। उन सामानों में एक मुकुट एक गदा, कुछ तलवारें और कुछ धनुषबाण थे। ये माल असबाब मिलते ही बच्चों का खेल बदल गया। किसी ने क्या, किसी ने क्या उठा लिया।
एक बच्चे ने मुकुट पहन लिया। वह देखते ही देखते साधारण प्रजा से राजा हो गया। वे बच्चे जिनके हाथ में रबर और कपड़े की गेंदें थी उन्होंने इन्हें फेंक कर तीर, तलवार और गदा हाथ में थाम ली।
अभी तक जिन खिलौनों से खेल रहे थे वे उन्हें गुदगुदा रहे थे। अब जिसने जो सामान उठा लिया उसके अनुसार बड़ा परिवर्तन देखा गया। शस्त्रों ने खुद के गुणधर्मों और उनकी पहचान के अनुसार उन बच्चों पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। देखते ही देखते कुछ ही पलों में बच्चों के आचरण बदल गए।
हमारा बाहरी संसार हमारे भीतरी संसार को बदल सकता है। हमारे व्यवहार, आचरण, जीवन शैली और व्यक्तित्व बदल सकता है। पहले बाहर का वातावरण हमारे भीतर को बदलता है फिर हमारा भीतर हमारे चारों ओर वही पसन्द करता है। एक कहानी सुनी थी कि कुछ सियार बस्ती से एक बच्चे को उठा कर ले गये। उसका लालन पालन किया। बच्चा बड़ा हुआ। उसकी भाषा में केवल दो अक्षर का एक शब्द था 'हू-हू'। वह सियारों की तरह चारों हाथ पैरों से चलता था। याने बाहर का संसार भीतर गया और भीतर उसके अनुरूप बाहर का वैसा ही संसार खड़ा हो गया। लोहा जिसके संग रहता है उसके जैसा ही काम करता है।
"एक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परो।"
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बड़ा बनना आसान नहीं
एक होता है दहीं बड़ा। इस बड़े के बड़ा बनने की यात्रा कौतुहल भरी है। क्रमशः उड़द के दानों को पीस कर दाल बनी, छिलके अलग किए गए, उसे गलाया गया इतना कि जब तक खमीर न उठ जाए। फिर एक बार और पीसा गया, टिकिया बना कर उबलते तैल में तला गया वहाँ से निकाल कर एकदम ठन्डे पानी में डाला गया। अब बाहर निकल कर उस पर दहीं और चटनी डाली गई। तब जाकर आपको यह बड़ा दिखा है।
यह प्रक्रिया बड़ा बनाने की आपको रेसिपी नहीं बताई जा रही है बल्कि यह कर्म और क्रिया के अद्भुत सम्मिश्रण का संवाद है। दलहन से लेकर बड़े बनने तक कितनी लम्बी और कठिन-कठिन वेदनाओं से, तप से, धैर्य से और क्रियाओं से उसे गुजरना पड़ा है। बनने के बाद लोग इसे बड़ा कहते है। इस बिम्ब और आधार को व्यक्तित्व निर्माण के सापेक्ष में देखें।
हर कामयाब आदमी का जीवन ऐसे ही कठिन कर्म और क्रियाओं से भरा होता है। इसका संस्कार देने वाला रसोइये की तरह गुरु और माता-पिता है। दाल की तरह आदमी का जीवन है, कृमिक क्रिया तप है और उत्पाद व्यक्तित्व है। एक बात और, साध्य और साधन पता न हो तो साधक कैसा। हर कामयाब आदमी अपनी तरह का पहला नहीं है। उसका आदर्श व्यक्तित्व जाने अनजाने में कोई है, प्रणेता कोई है। उसकी कर्म की, तप की, सृजन की अपनी स्वयं की शैली होती है जो बाद में उसकी पहचान बन जाती है।
इसलिये स्पर्धा, निष्ठा, चुनौती, श्रम और साधना के बीज लेकर अपनी फसल खुद खड़ी करो। दिशा अपने विवेक से चुनो। हर व्यक्ति अपने आप में मौलिक है इसलिये यह पक्का है कि सृजन भी मौलिक होगा। नकल करने वाले लोगअसली नहीं हो सकते। दहीं बड़ा भी प्रसिद्ध हो तो इन्दौर के 'जोशी जी का दहीबड़ा' जैसा कि वह अपनी अलग पहचान रखता है। ध्यान रखो बिना मेहनत के फसल नहीं खरपतवार उगते हैं।
"महान जीवन का मार्ग कभी सुगम नहीं होता।"
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प्रेम द्वैत से अद्वैत की ओर जाने का मार्ग है। एकत्व की यात्रा है। अलगाव का बहिष्कार है। समस्त के प्रति समरसता का संचारीभाव है। किसी अन्य में हो रही पीड़ा की स्वानुभूति करता है प्रेमी।
धूप में, लू में जल रहे नन्हे पौधे की जलन अगर तुम्हें भी जलाने लगती है और तुम उसके समाधान में दौड़ते फिर रहे हो तब समझो तुम्हें पौधे से प्रेम हो गया है क्योंकि उस घड़ी तुममें और पौधे से द्वैत भाव समाप्त हो चुका है। प्यास से व्याकुल हिरण जंगल में पानी की तलाश मैं दौड़ता है और उसे देख कर तुम उतने ही व्याकुल हो रहे हो तो तुम उसे अलग समझना ही छोड़ देते हो। उसकी पीड़ा तुम्हारी अपनी पीड़ा हो जाती है तब तुम्हारा प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है।
तुम शायद जानते ही नहीं हो या तुम्हारा ध्यान उस ओर कभी नहीं गया कि प्रकृति और परमात्मा तुमसे कितना प्रेम करता है? तुम्हारी भूख का अहसास करके इन्होंने तुम्हारे लिये आहार तैयार किये हैं। तुम्हें प्यास लगेगी इसलिये समुन्दर से उठा कर बादल भेजे हैं, नदियाँ बहाई हैं, धरती के उदर में पानी भरा है। यह आहार और पानी तुम्हारे भीतर जा कर तुमसे भिन्न होने का, द्वैत होने का भाव स्वयं ही समाप्त कर देगा, तुमसे एकाकार कर लेगा। सुबह सुबह से आ कर सूरज अपनी ऊर्जा से तुम्हें सराबोर कर देता है और तुम अपनी दैनन्दिनी पूरी कर पाते हो, तुम्हें पता ही नहीं चलता कि कौन तुम में मिल कर अद्वैत का भाव समाप्त कर देता है और तुममें एकात्म हो कर हर क्रिया प्रक्रिया में शामिल हो जाता है। यह प्रकृति और परमात्मा का तुम्हारे प्रति प्रेम ही है। वह तुमसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अभिन्न है।
"प्रेम संसार भर से द्वैत का भाव तिरोहित करने में समर्थ है।"
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भरोसा भारी है
क्या आप जानते हैं बूढ़ा लकड़ी की बेजान लाठी लेकर उसके सहारे से क्यों चलता है? इसके दो कारण समझ में आते हैं।
पहला कारण तो यह है कि उसके आसपास ऐसा कोई और मौजूद नहीं है जो उसके चलने में सहायक हो। दूसरा कारण यह है कि वह लाठी को टेक टेक कर चलता रहता है और उस पर पूरा भरोसा भी करता है कि यह लाठी उसे कम से कम गिरने-फिसलने नहीं देगी। बड़े मजे की बात यह है कि बूढ़ा लाठी को लेकर चल रहा है, न कि लाठी बूढ़े को ले कर चल रही है। पर बूढ़े को आभास होता है कि वह लाठी उसे हर खतरे से बचा कर अपनी मंजिल तक ले जाएगी, गिरने पड़ने से बचाएगी। उसी तरह जब हमें नदी के पार जाना है तो मल्लाह और नाव दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। हवाई जहाज में बैठने से पहले पायलट और हवाई जहाज दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। ऑपरेशन टेबल पर पहुँचने के साथ ही डॉ और उसके हुनर-इल्म पर भरोसा करना होता ही है, इतना भरोसा कि अपने किसी भी सगे पर भी नहीं किया होगा। हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में कदम कदम पर हम भरोसा ढूँढते रहते हैं।
यही भरोसा ले कर सद्गुरू के चरणों में जावें और खुद को उसके बताए गए मार्ग पर चलना शुरू कर दो। भरोसा इतना पक्का होना चाहिये सद्गुरु पर कि वह हमारी नैया पार लगा देगा। एक बार भरोसा कर के देखो उसकी गुरुतापर, उसमें उपलब्ध गुरु सत्ता पर, उसकी उर्मियों में बसी चेतना पर। फिर हमने अगर छोड़ भी दिया तो वह हमें पकड़े रहेगा क्योंकि गुरू एक व्यक्ति नहीं वह एक चेतन सत्ता है। जीव जब अपनी सुधि खोने लगता है तब तो गुरू का काम और महत्वपूर्ण हो जाता है। वही मार्ग और मंजिल तक ले जाता है। जैसे कि ईश्वर की सत्ता कभी प्रत्यक्ष नहीं दीखती पर धृति अथवा धर्म के रूप में सृष्टि का कण कण उस परमात्मा के कड़े अनुशासन में चलता है, चाहे जानो या अनजान ही बने रहो।
"इसलिये भरोसा करो और चलो उस ओर अपने कल्याण के लिये।"
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परमात्मा का अनुशीलन
क्या तुमने कभी किसी फूल के परागकणों को तितलियों का आह्वान करते देखा है? क्या तुमने मन्दिर के शिखर पर उस ध्वज को हवा के परों पर थिरकते देखा है? क्या तुमने गुनगुन करती मधुपरियों के शिल्प में विश्वकर्मा के सृजन का आभास किया है? क्या तुमने कभी दीवार पर चढ़ती चीटियों के पदचाप में कर्मवीरा की आहट सुनी है? क्या रुई जैसे हलके फुलके उड़ते फिरते बादलों को हजारों मील चल कर लाखों टन पानी ढोते देखा है? और फिर इन्हीं बादलों को सिंहनाद करते हुए पर्वतों, नगरों, वनस्पतियों का अभिषेक करते देखा है? क्या कभी किसी बीज के गर्भ से सफेद झक्क अंकुरण को झाँकते देखा है? क्या तुम जानते हो कि पानी में शीतलता क्यों है और वह सबसे निचला तल ढूँढता क्यों है? अग्नि जलाती क्यों है? धरती, आकाश, अगन, पवन, पानी जैसे तत्व सख्ती से अनुशासन में रह कर अपने अपने धर्म का पालन क्यों करते हैं? प्रकृति के अधिकतर व्यवहार में हम कैसे होता है यह तो जानते हैं पर यह नहीं जानते कि इन नियमों को बना कर उनको पालन कौन करवाता है?
ये शबनम फूल तारे चाँदनी में अक्स किस का है?
सुनहरी धूप छाँव रौशनी में अक्स किस का है?
ये ढलती शाम ये क़ौस-ए-क़ुज़ह की रंग-आमेज़ी
ये नीले आसमाँ की दिलकशी में अक्स किस का है?
हाँ ये सारी क्रियाएँ और कर्म केवल संकेत मात्र के लिये गिनवाए गये हैं जबकि प्रकृति का अणु-अणु ऐसा ही कुछ न कुछ हर घड़ी हर पल कर रहा है। न तुमने कभी ध्यान से देखा, न तुम्हारे कान इन्हें सुन पाये, न ही तुम कोई संवेदना ही जागी हम पर इनके द्वारा किये गए अनन्त उपकारों के प्रति। ये सब करते हुए भी कभी थके नहीं, रुके नहीं, झुके नहीं।
देखो! तुम बस दाैड़ रहे हो पर इस दौड़ में वे अनमोल पल छोड़ रहे हो। प्रकृति गा रही है, नाच रही है, तप रही है, खप रही है फिर भी हम सब के लिये विपुल आहार तैयार कर रही है, खेतों में, खलिहानों में, उपवनों में, चौगानों में। कोई तो है जो जानता है तुम्हारी भूख को, तुम्हारी प्यास को और शायद तुम्हारी हर छोटी बड़ी सभी जरूरतों को।
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचि जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।।9/10।।
हम यह जरूर महसूस करें कि
“प्रकृति माँ के, परमपिता परमेश्वर के इस उपकार को और उनके कृतज्ञ होवें।“
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