Wednesday, 26 April 2023

2 lahar

लहर-लहर 37-39
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प्रार्थना के स्वर

दुःख की ऊपरी मंजिल है दर्द। दर्द एक संकेत है कि आप ज़िंदा है, यह आपकी मसूसियत है, आपके अन्तरतम को गहराइयों तक पहुँचने वाली संवेदना है। यह एक मेकेनिज्म है जो सीधे आपके शारारिक, मानसिक सिक्यूरिटी सिस्टम से जुड़ा होता है। उस अदृश्य सिस्टम से जो जीवित है, जो संवेदी है, जिसके पास केमिकल और मानासिक संसाधनों का ऐसा भण्डार है जो अपने दूत भेज कर डेमेज रिपेयर कर सकता है। हो सकता है कि यह डेमेज हमारे शरीर ओर मानस को बीमार कर देता।
मानव ईश्वर की अनुपम कृति है, यूटिलिटी है। इस समस्त प्रक्रिया का एक आध्यात्मिक पहलू यह है कि हमारे दु:ख दर्द का सम्पूर्ण सिस्टम अपनी प्रार्थना के भाव सम्प्रेषण की संवाहिकाओं से सीधा जुड़ा होता है। समस्या एक टास्क है और संकेत उन शिकायतों का, उन आशाओं-निराशाओं का जो मानव के व्यवहारिक जीवन की अंगभूत हैं। रोज-मर्रा के जीवन में हम ऐसे दुःख दर्दों से रूबरू होते ही रहते हैं परन्तु प्रार्थना के माध्यम से ये अपने इष्ट को संप्रेषित होती हैं। यह प्रार्थना एक ऐसा उपादान हैं जो आपको महसूस नहीं होने देती कि आप अकेले है। आपके साथ आपका इष्ट है जो आपकी आपसे अधिक चिन्ता करता है।
"आर्त पुकार जब प्रार्थना में सम्मिलित होती है तो वह दवा और दुआ बन कर लौटती है।"

रामनारायण सोनी
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जिन्दगी तुम से पूछेगी

जिन्दगी कल तुमसे कुछ सवाल पूछ सकती है, हो सकता है उसे तुम कल इसका जवाब न दे पाओ। आज की इस सुबह कल के सवालों में से एक एक कर के जवाब देने निकल पड़ो वरना बहुत सारे सवालों का पहाड़ खड़ा हो जावेगा फिर शायद किसी एक का भी जवाब नहीं दे पाओगे। यह जरूरी नहीं है कि तुम सभी सवालों के उत्तर खोज लोगे पर यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि तुमने अपनी ओर से हर सवाल के उत्तर खोजने का प्रयास किया है कि नहीं? हो सकता है कि किसी सवाल का हल तुम्हारी अपनी क्षमता से भी परे हो, पर पूरी तसल्ली करो कि उसका हल करने की कोशिश तुमने प्राण पण से की है।
थोड़ी देर के लिये सोचो कि आज का यह दिन मेरी जिन्दगी का आखरी दिन हो सकता है परन्तु निश्चित रूप से यह भी मान लो कि आज की यह सुबह मेरी जिन्दगी की ही पहली सुबह है।
तुम्हें ऐसे जवाब खड़े करना है कि सवाल खुद गिरने लगें। सोचो कि उस महाप्रयाण के पूर्व तुम्हारे पल्ले में अधिक से अधिक तसल्ली बँधी हो। तुम्हारी जिन्दगी सिर्फ तुम्हीं से सवाल कर सकती है अन्य और किसी से नहीं। इसके हर सवाल का जवाब भी सिर्फ तुम्हें ही देना है। यहाँ उधार का आदमी काम नहीं आवेगा।
आज से, अभी से यह सोचना छोड़ दो कि लोग क्या कहेंगे? अपनी नाव की पतवार किसी और को क्यों पकड़ा रहे हो। अक्षम हो तो कोई बात नहीं पर सक्षम होते हुए भी ऐसा करते हो तो जिन्दगी तुम से, तुम्हारी बेचारगी से ही पूछेगी। थोड़ा पलट कर देखो; कहीं ऐसा तो नही है कि जिन्दगी की बेहतरी के लिये जो तुम कर सकते थे और नहीं किया। अगर कोई चूक हुई भी हो तो आगे से ऐसा कोई वाकिया फिर न दोहरोओ।
निश्चय करो कि "आज से मेरे सवालों के जवाब मेरे ही होना चाहिये।"

रामनारायण सोनी
19.12.22

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बीच में खड़े रहना सीख लो
इधर कुआँ उधर खाई बीच रहना सीख भाई। घट्टी के दो पाटों के बीच रहना है तो कील-मकड़ी के पास रहो, वरना पिसना पक्का है। नदी को बहना है तो दो किनारों के बीच से गुजरना है। गुलाब को खिलना है तो काँटों के बीच रहना ही है। पगडण्डियों को घने जंगल और टेढ़े मेढ़े स्थान के बीच से ही गुजरना है। हमारे शरीर में सबसे नर्म सी जबान को सबसे कठोर बत्तीस दाँतों के बीच रहना है।
भूत और भविष्य के बीच में वर्तमान को साध कर कर्म रत रहना जरूरी है। याद रखो पतझड़ और ग्रीष्म के बीच बसन्त उपस्थित होता है। जन्म और मृत्यु के बीच जीवन खड़ा रहता है। कलाकार द्वारा कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति और कर्म के आनन्द में निमग्न रह कर कार्यरत रहना इस तथ्य का प्रमाण है।
फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य की चिन्ता में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना, अपने नियत कर्म के प्रति उदासीन होना है। यह जानते हुए भी कि जो बीत गया वह पुनः लौटेगा नहीं फिर भी भूत काल के क्षणों में खोये रहने का मतलब है अपने वर्तमान को कर्म-शून्य रखना।
दो विपरीत ध्रुवों के बीच में सम-स्थित रहने का अर्थ है स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में प्राप्त करना। सफलता और विफलता, ऊँच-नीच, सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ के बीच भी कर्म में स्थित रहना समत्व योग है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2/48।।गीता।।

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